भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 680 में से

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पृष्ठ 135

प्रथम उद्योतः ७५ लोचनम् करोषीति सख्यभिप्रायरूपश्चाटुविशेषो व्यङ्ग्यः । अत्र तु व्याख्यानद्वयेऽपि व्यवसितात्प्रतीपगमनात्प्रियतमगृहगमनाच्च निवर्तस्वेति पुनरपि वाच्य एव विश्रान्तेर्गुणीभूतव्यङ्ग्यभेदस्य प्रेयोरसवदलङ्कारस्योदाहरणमिदं स्यात्, न ध्वनेः । तेनायमत्र भावः—काचिद्रभसात्प्रियतममभिसरन्ती तद्गृहाभिमुखमाग- च्छता तेनैव हृदयवल्लभेनैवमुपश्लोक्यतेऽप्रत्यभिज्ञानच्छलेन, अत एवात्मप्रत्य- भिज्ञापनार्थमेव नर्मवचनं हताश इति । अन्यासाञ्च विघ्नं करोषि तव चेप्सित- लाभो भविष्यतीति का प्रत्याशा । अत एव मदीयं वा गृहमागच्छ, त्वदीयं वा गच्छावेत्युभयत्रापि तात्पर्यादनुभयरूपो वल्लभाभिप्रायश्चात्वात्मा व्यङ्ग्य इत्यत्येव व्यवतिष्ठते । अन्ये तु—'तटस्थानां सहृदयानामभिसारिकां प्रतीय- मुक्तिः' इत्याहुः । तत्र हताशे इत्यामन्त्रणादि युक्तमयुक्तं वेति सहृदया एव प्रमाणम् । भी (नायिका द्वारा) व्यवसित प्रतीपगमन (अपने घर के प्रति गमन) और प्रियतम के गृह के गमन से 'लौट आओ' (निवृत्त हो) यह जो वाच्य है उसमें ही (सखीगत नायिकाविषयकभावरूप रति अथवा नायकगत नायिकाविषयक रति के) विश्रान्त होने के कारण गुणीभूतव्यंग्य के भेद जो क्रमशः प्रेयोऽलङ्कार और रसवदलङ्कार हैं उनका यह उदाहरण होगा, न कि ध्वनि का। इसलिए' यहाँ यह भाव है—कोई नायिका झटपट प्रियतम के घर के प्रति अभिसार करती है, उसी समय मार्ग में उसके घर की ओर आता हुआ वही प्रियतम अप्रत्यभिज्ञान (नायिका को न पहचानने) के बहाने उसे इस प्रकार प्रशंसा करता है। इसीलिए अपने को पहचानने के लिए ही नर्मवचन 'हताशे' (का प्रयोग) है। दूसरी (अभिसारिकाओं) के विघ्न पहुँचाती है, फिर तेरा ईप्सित लाभ होगा, इसकी क्या प्रत्याशा है ? अतएव 'मेरे घर आ, या हम दोनों तेरे घर चलें' इन दोनों में तात्पर्य होने के कारण अनुभयरूप चाटुगर्भित प्रिय का अभिप्राय व्यंग्य इतने में ही व्यवस्थित होता है। दूसरे तो यह कहते हैं कि यह तटस्थ सहृदयों का अभिसारिका के प्रति वचन है। वहाँ 'हताशे' यह आमन्त्रणादि ठीक है अथवा ठीक नहीं, सहृदयजन ही प्रमाण हैं। १. प्रस्तुत गाथा 'दे आ पसिअ०' को आचार्य ने वक्ता के भेद के आधार पर तीन-चार प्रकार से लगाया है। पहले व्याख्यान के अनुसार नायक के घर पर नायिका पहुँची तब नायक उसके समक्ष गोत्रस्खलन आदि अपराध कर बैठा । इस पर तुनक कर जब वह चल पड़ने के लिए उद्यत हुई तब नायक उसकी प्रशंसा के द्वारा उसे निवृत्त करने का प्रयत्न करने लगा । उसने कहा कि वह अपने और मेरे सुख में तत्काल विघ्न तो कर ही रही है अन्य अभिसारिकाओं के सुख में भी विघ्न डाल रही है। 'अभिसारिका' वह नायिका कहलाती है जो अन्धकार आदि में प्रिय का अभिसरण करती है'। यहाँ नायक का चाटुरूप अभिप्राय व्यङ्ग्य है। दूसरे व्याख्यान के अनुसार यह नायिका की सखी का वचन है, नायिका को सखी ने मना किया कि वह तत्काल अभिसार न करे;

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