भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 680 में से

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पृष्ठ 137

प्रथम उद्योतः ७७ लोचनम् कस्य वेति । अनीर्ष्यालोरपि भवति रोषो दृष्ट्वैव; अकृत्वापि कुतश्चिद्देवा- पूर्व्वतया प्रियायाः सव्रणमधरमवलोक्य । सभ्रमरपद्माघ्राणशीले शीलं हि कथंचि- दपि वारयितुं न शक्यम् । वारिते वारणायां, वामे तदनङ्गीकारिणि । सहस्वेदानी- मुपालम्भपरम्परा मित्यर्थः । अत्रायं भावः—काचिद्विनीता कुतश्चित्खण्डिता- धरा निश्चिततत्सविधसंनिधाने तद्भर्त्तरि तमनवलोकमानयेव कयाचिद्विदग्ध- सख्या तद्वाच्यतापरिहारायैवमुच्यते सहस्वेदानीमिति वाच्यमविनयवतीविषयम् । भर्तृविषयं तु-अपराधो नास्तीत्यावेद्यमानं व्यङ्ग्यम् । सहस्वेत्यपि च तद्विषयं व्यङ्ग्यम् । तस्यां च प्रियतमेन गाढमुपालभ्यमानायां तद्व्यलीकशङ्कितप्रातिवे- शिकलोकविषयं चाविनयप्रच्छादनेन प्रत्यायनं व्यङ्ग्यम् । तत्सपत्न्यां च तद्दु- किया गया। अब विषय के भेद से भी व्यंग्य का भेद¹ है, यह कहते हैं—कहीं पर—। व्यवस्थापित—। अर्थात् विषय का भेद भी विचित्ररूप से रहता हुआ सहृदयजनों के द्वारा व्यवस्थापित किया जा सकता है । अथवा प्रिया के व्रणयुक्त······ ईर्ष्या से रहित व्यक्ति के भी क्रोध देखकर ही चढ़ आता है । न करके भी किसी कारण अपूर्व भाव से प्रिया के व्रणयुक्त अधर को देखकर । भौंरे सहित कमल को सूँघने के शील वाली—। शील किसी प्रकार हटाया नहीं जा सकता । वारित में, निवारण में, वामा अर्थात् निवारण को अङ्गीकार न करनेवाली । अब सहन कर ( दुष्परिणाम भुगत )—। अर्थात् उलहनों की परम्परा को सहन कर ( अपने किए का दुष्परिणाम भुगत ) । यहाँ भाव यह है—कोई चालाक ( विदग्ध ) सखी किसी अविनीत नायिका से, जो कहीं से ( जार आदि के द्वारा ) अपना अधर-खण्डित करा चुकी है, उसके पति को निश्चितरूप से सन्निहित जानकर, उसे ( उसके पति को ) न देखती हुई-सी, पति के द्वारा उपालम्भ मिलने के परिहार के लिए ( जिससे कि उसका पति खण्डित-अधर देखकर उसे न डाँटे ) कहती है । 'सहन कर' ( दुष्परिणाम भुगत ) यह वाच्य अविनयवती उस नायिका के प्रति है । पति के प्रति तो—'इसका अपराध नहीं है' यह आवेद्यमान ( निरपराधत्व ) व्यंग्य होता है । प्रियतम के द्वारा अधिक उपालम्भ प्राप्त उस नायिका के होने पर पति का अप्रिय करने से शंकित आस-पास के लोगों के प्रति नायिका के अविनय के प्रच्छादन के द्वारा ( नायिका के निरपराध यहाँ 'निवर्तस्व' वाच्य है, किन्तु नायक का यह तात्पर्य व्यङ्ग्य है कि मेरे घर आ अथवा हम दोनों ही तुम्हारे घर चलें, इस प्रकार यह अनुभय रूप व्यङ्ग्य है । चतुर्थ व्याख्यान के अनुसार यहाँ तटस्थ सहृदयों का किसी अभिसारिका के प्रति वचन है। आचार्य के कथनानुसार इस अंश में 'हुताशे' यह आमन्त्रण आदि ठीक बैठ जाता है या नहीं इसका निर्णय तो सहृदय स्वयं कर सकते हैं ! १. व्यङ्ग्य और वाच्य में विषयभेद और स्वरूपभेद इन दो ही भेदों का दिङ्मात्र प्रदर्शन 'ध्वन्यालोक' में किया गया है। मम्मट आदि अन्य आचार्यों ने और भी कई भेद बतलाए हैं । 'साहित्यदर्पण' में सबका संग्रह एक कारिका में किया गया है—