भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 149, कुल 680 में से

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पृष्ठ 149

प्रथम उद्योतः ८९ 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 ध्वन्यालोकः विविधवाच्यवाचकरचनाप्रपञ्चचारुणः काव्यस्य स एवार्थः सारभूतः । चादिकवेर्वाल्मीकेः निहतसहचरीविरहकातरक्रौञ्चाक्रन्द- जनितः शोक एव श्लोकतया परिणतः । विविध वाच्य, वाचक और रचना के प्रपञ्च से सुन्दर काव्य का वही अर्थ सारभूत है । जैसा कि आदिकवि वाल्मीकि का निहत¹ सहचरी के वियोग से कातर क्रौञ्च की चीख (आक्रन्द) से उत्पन्न शोक ही श्लोकरूप से परिणत हो गया । लोचनम् अगम इति च्छान्दसेनाडागमेन । स एवैत्येवकारेणोदमाह—नान्य आत्मेति । तेन यदाह भट्टनायकः— शब्दप्राधान्यमाश्रित्य तत्र शास्त्रं पृथग्विदुः । अर्थतत्त्वेन युक्तं तु वदन्त्याख्यानमेतयोः ॥ द्वयोर्गुणत्वे व्यापारप्राधान्ये काव्यधीर्भवेत् । इति तदपास्तम् । व्यापारो हि यदि ध्वननात्मा रसनास्वभावस्तन्नापूर्व- मुक्तम् । अथाभिधैव व्यापारस्तथाप्यस्याः प्राधान्यं नेत्यावेदितं प्राक् । श्लोकं व्याचष्टे—विविधेति । विविधं तत्तदभिव्यञ्जनीयरसानुगुण्येन विचित्रं कृत्वा वाच्ये वाचके रचनायां च प्रपञ्चेन यच्चारु शब्दार्थालङ्कारगुणयुक्त- उसे वमन नहीं करता है।' (वाल्मीकि के पद्य में) 'अगमः' में वैदिक नियमानुसार अडागम हुआ है । 'वही' इस 'एव' ( 'ही' ) कहने से यह कहा है—दूसरा आत्मा नहीं है । इस लिए जो कि 'भट्टनायक' कहते हैं— 'शब्द के प्राधान्य का आश्रयण करके शास्त्र को अलग मानते हैं, अर्थतत्त्व से युक्त को 'आख्यान' कहते हैं और इन दोनों (शब्द-अर्थ) के गुणीभूत होने की स्थिति में व्यापार का प्राधान्य होने पर काव्य की धी होती है ।' वह निरस्त हो जाता है । यदि ध्वनन रूप व्यापार रसना-स्वभाव है आपने अपूर्व नहीं कहा । यदि अभिधा ही व्यापार है तथापि उसका प्राधान्य नहीं है, यह पहले बताया जा चुका है ! श्लोक की व्याख्या करते हैं—विविध— । विविध अर्थात् उस-उस अभिव्यञ्जनीय रस के आनुगुण्य से विचित्र बनाकर, वाच्य, वाचक और रचना में प्रपञ्च जो चारु 〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰 १. 'वाल्मीकि रामायण' में उल्लिखित 'क्रौञ्चवध' घटना के अनुसार क्रौञ्च के जोड़े में से नर क्रौञ्च का ही वध निर्दिष्ट है और उसके वियोग में क्रौञ्ची रुदन करती है—'तं शोणितपरीताङ्गं चेष्टमानं महीतले । दृष्ट्वा क्रौञ्ची रुरोदार्ता करुणं खे परिभ्रमा ॥' प्रस्तुत ग्रन्थ में क्रौञ्चयुगल में सहचरी के वध और क्रौञ्च के आक्रन्द का उल्लेख है, इतना ही नहीं, 'लोचन' से भी सहचरी क्रौञ्ची का वध ही सिद्ध होता है । साथ ही 'काव्यमीमांसा' में राजशेखर ने भी 'निपादनिहतसह- चरीकं क्रौञ्चयुवानम्' उल्लेख द्वारा क्रौञ्ची का वध माना है । यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है