भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 153

प्रथम उद्योतः ९३ लोचनम् वाग्धेनुर्दुग्ध एतं हि रसं यद्बालतृष्णया । तेन नास्य समः स स्याद् दुह्यते योगिभिर्हि यः ॥ तदावेशेन विनाप्याक्रान्त्या हि यो योगिभिर्दुह्यते । अत एव— यं सर्वशैलाः परिकल्प्य वत्सं मेरौ स्थिते दोग्धरि दोहदक्षे । भास्वन्ति रत्नानि महौषधींश्च पृथूपदिष्टां दुदुहुर्धरित्रीम् ॥ इत्यनेन साराग्रयवस्तुपात्रत्वं हिमवत उक्तम् । 'अभिव्यनक्ति परिस्फु- रन्तमिति । प्रतिपत्तॄन् प्रति सा प्रतिभा नानुनीयमाना, अपि तु तदावेशेन भासमानेत्यर्थः । यदुक्तमस्मदुपाध्यायभट्टतौतेन—'नायकस्य कवेः श्रोतुः समानोऽनुभवस्ततः ।' इति । 'प्रतिभा' अपूर्ववस्तुनिर्माणक्षमा प्रज्ञा; तस्या '( सहृदय जन रूप ) वत्स में स्नेह के कारण वाणीरूप धेनु इस रस को जो कि प्रस्तुत करती है, इस लिए इसके समान वह ( रस ) रस नहीं हो सकता जिसे योगी लोग दुहा करते हैं ।' जिसे योगी लोग रसावेश के बिना ही केवल बलात्कारपूर्वक दुहा करते हैं । अत एव— 'दोहन कार्य में चतुर दुहने वाले मेरुपर्वत के विद्यमान रहने पर सारे पर्वतों ने जिस हिमालय को वत्स बनाकर पृथु के द्वारा प्रदर्शित पृथिवी से प्रदर्शित चमकदार रत्नों और महौषधियों का दोहन किया ।' इससे सारवस्तुओं का पात्रत्व हिमवान् का कहा है । 'परिस्फुरित होते हुए को अभिव्यञ्जित करती है ।' अर्थात् प्रतिपत्ता ( सहृदय ) जनों के प्रति वह प्रतिभा अनुमीयमान नहीं होती, बल्कि उसके ( प्रतिभा के विषयीभूत रस के ) आवेश से भासित होता है । जैसा कि हमारे उपाध्याय भट्ट तौत ने कहा है—'नायक, कवि और श्रोता का उससे ( उस कारण ) समान अनुभव होता है ।' अपूर्व वस्तु के निर्माण में समर्थ प्रज्ञा 'प्रतिभा' ( कहलाती ) है, उसका 'विशेष', रसावेश के कारण की गई है । लोचनकार का कहना है कि 'वस्तु' शब्द 'अर्थ' की व्याख्या है और 'तत्त्व' शब्द 'वस्तु' की व्याख्या है । तात्पर्य यह कि वस्तु, अलङ्कार और रस रूप अर्थों अर्थात् वस्तुओं में जो वस्तु अर्थात् तत्त्व या सार । १. आचार्य ने महाकवियों की वाणी को व्यङ्ग्यार्थ को प्रवाहित करने वाली कहा है। यह एक प्रकार की धेनु है जो सहृदयरूपी वत्सों को स्वयं दिव्य रस पिलाकर आनन्दित करती है । यहाँ लोचनकार ने 'वचन' उद्धृत करके यह निर्देश किया है कि वह आनन्द, जो सहृदयों को कविता से प्राप्त होता है, तथा वह आनन्द, जो योगियों को समाधि में मिलता है, दोनों में बहुत अन्तर है । इस प्रकार कवियों के प्रतिभा-विशेष का पता चलता है । जो कविता जितना ही रस का अनुभव कराती है उतना ही उससे कवि की प्रतिभाविशेष का अन्दाजा मिलता है । और उसी अभिव्यक्त प्रतिभा-विशेष के आधार पर ही कवि की महाकवि की कोटि में गणना होती है । संसार में हजारों की संख्या में कवि होते आए हैं, किन्तु वह प्रतिभा-विशेष का ही चमत्कार है जो कालिदास प्रभृति कुछ ही कवि महाकवि की श्रेणी में आते हैं ।