ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः ९५ ध्वन्यालोकः सोऽर्थो यस्मात्केवलं काव्यार्थतत्त्वज्ञैरेव ज्ञायते । यदि च वाच्यरूप एवासावर्थः स्यात्तद्वाच्यवाचकरूपपरिज्ञानादेव तत्प्रतीतिः स्यात् । अथ च वाच्यवाचक लक्षणमात्रकृतश्रमाणां काव्यतत्त्वार्थभाव- नाविमुखानां स्वरश्रुत्यादिलक्षणमिवाऽप्रगीतानां गान्धर्वलक्षणविदाम- गोचर एवासावर्थः । वह अर्थ जिस कारण काव्यार्थ के तत्त्वज्ञ लोगों द्वारा ही जाना जाता है। और, यदि वह अर्थ वाच्यरूप ही होता तो वाच्य और वाचक के रूप के परिज्ञान से ही उसकी प्रतीति होती । और भी, वाच्य-वाचक के लक्षणमात्र में जिन्होंने श्रम किया है तथा काव्यतत्त्वार्थ की भावना से पराङ्मुख हैं उनके लिए यह अर्थ, गाने में असमर्थ किन्तु सङ्गीतशास्त्र (गान्धर्व) के लक्षणों को जाननेवालों के लिए स्वर और श्रुति आदि के तत्त्व की भाँति, अगोचर ही है। लोचनम् स्वराः षड्जादयः सप्त । श्रुतिर्नाम शब्दस्य वैलक्षण्यमात्रकारि यद्रूपान्तरं तत्परिमाणा स्वरतदन्तरालोभयभेदकल्पिता द्वाविंशतिविधा । आदिशब्देन जात्यंशकग्रामरागभाषाविभाषान्तरभाषादेशीमार्गा गृह्यन्ते । प्रकृष्टं गीतं गानं येषां ते प्रगीताः, गातुं वा प्रारब्धा इत्यादिकर्मणि क्तः । प्रारम्भेण चात्र फलप- र्यन्तता लक्ष्यते ॥ ७ ॥ आदि सात । शब्द का वैलक्षण्यकारी जो रूपान्तर है उसके परिमाण की ‘श्रुति’ होती है वह स्वर, स्वरान्तराल, और उभय के भेद से बाईस¹ प्रकार की होती है । ‘आदि’ शब्द से जात्यंश,² ग्राम, राग, भाषा, विभाषा, अन्तरभाषा, देशी मार्ग गृहीत होते हैं। प्रकृष्ट गीत या गान है जिनका वे ‘प्रगीत’ हैं अथवा गाने के लिए ‘प्रारब्ध’ इस प्रकार ‘आदिकर्म’ में ‘क्त’ प्रत्यय है। यहाँ ‘प्रारम्भ’ से फलपर्यन्तता लक्षित होती है। १. मूल में ‘अप्रगीत’ और ‘प्रगीत’ दोनों पाठ हैं। लोचनकार ने दोनों के अनुसार व्याख्यान किया है; ‘अप्रगीत’ का अर्थ करते हैं कि वे लोग प्रगीत नहीं अर्थात् प्रकृष्ट गान नहीं करते हैं । ‘प्रगीत’ का व्याख्यान है कि जिन्होंने गान का प्रारम्भ ही किया है अर्थात् जो अभी गाने में सफल नहीं हैं । स्पष्टार्थ यह कि जिस प्रकार गान-विद्या में निपुणता हासिल कर लेने वाला यदि गान का अभ्यास न करने पर स्वर और श्रुति आदि के तत्त्वों से अपरिचित रहता है उसी प्रकार केवल वाच्य-वाचक मात्र में श्रम करने वाले तथा काव्यतत्त्वार्थ की भावना से विमुख लोग उस प्रतीयमान अर्थ को नहीं समझ सकते । स्वर और श्रुति आदि सङ्गीत-शास्त्रीय तत्त्वों का विशकलन ग्रन्थान्तर से अवगत करना चाहिए । ‘सङ्गीतरत्नाकर’ में इनका विवेचन विशद रूप से मिलता है।