ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः ९९ ध्वन्यालोकः यथा ह्यालोकार्थी सन्नपि दीपशिखायां यत्नवाञ्जनो भवति तदुपाय- तया । न हि दीपशिखामन्तरेणालोकः सम्भवति । तद्वद्व्यङ्ग्यार्थं प्रत्यादृतो जनो वाच्येऽर्थे यत्नवान् भवति । अनेन प्रतिपादकस्य कवेर्व्यङ्ग्यार्थं प्रति व्यापारो दर्शितः ॥ ९ ॥ प्रतिपाद्यस्यापि तं दर्शयितुमाह— यथा पदार्थद्वारेण वाक्यार्थः सम्प्रतीयते । वाच्यार्थपूर्विका तद्वत्प्रतिपत्तस्य वस्तुनः ॥ १० ॥ जैसे प्रकाश को चाहने वाला होता हुआ भी व्यक्ति दीपशिखा के लिए उस ( आलोक ) का उपाय होने के कारण यत्नवान् होता है, क्योंकि दीपशिखा के विना आलोक सम्भव नहीं, उसी प्रकार व्यंग्य अर्थ के प्रति आदरयुक्त जन वाच्य अर्थ में यत्नवान् होता है । इससे प्रतिपादक ( वक्ता ) कवि का व्यंग्य अर्थ के प्रति व्यापार दिखाया ॥ ९ ॥ प्रतिपाद्य के भी उस ( व्यापार ) को दिखाने के लिए कहते हैं— जिस प्रकार पदार्थ के द्वारा वाक्यार्थ प्रतीत किया जाता है उसी प्रकार उस वस्तु की प्रतिपत् ( प्रतीति ) वाच्यार्थपूर्विका होती है ॥ १० ॥ लोचनम् प्रतिपदिति भावे क्विप् । 'तस्य वस्तुन' इति व्यङ्ग्यरूपस्य सारस्येत्यर्थः । अनेन श्लोकेनात्यन्तसहृदयो यो न भवति तस्यैष स्फुटसंवेद्य एव क्रमः । विरुद्ध¹ है यह दिखाते हैं—अव इत्यादि द्वारा । आलोकन ( देखना ) आलोक है, अर्थात् वनिता के मुखारविन्द आदि का विलोकन । उसके लिए उपाय दीपशिखा है ॥९॥ 'प्रतिपत्'² इसमें भाव में 'क्विप्' प्रत्यय है । 'उस वस्तु की' अर्थात् व्यङ्ग्य रूप १. आशङ्का होती है कि जब वाच्य, वाचक और अभिधा व्यापार का पहले उपादान किया जाता है तब इसी कारण क्यों नहीं इन्हें ही प्रधान मानते हैं ? व्यङ्ग्य के प्राधान्य का पक्ष इस प्रकार ठीक नहीं । इसके समाधान में यह कहना है कि जो आप प्रथम उपादान को प्राधान्य का हेतु मानते हैं वह विरुद्ध है, अर्थात् इस हेतु द्वारा अप्राधान्य भी सिद्ध हो जाता है। मतलब यह कि किसी वस्तु को प्रधान इस लिए माना नहीं जा सकता कि उसका उल्लेख पहले होता है । तब तो जो उपाय होता है वह उपेय से पहले उल्लिखित होता है, ऐसी स्थिति में आप उपाय को भी प्रधान कहेंगे ! प्रस्तुत में वाच्य-वाचक-भाव भी प्रधानभूत व्यङ्ग्य-व्यञ्जक-भाव के उपाय हैं अतः उनका पहले उपादान होता है। इस प्रकार प्रथम उपादान मात्र से उन्हें प्रधान नहीं कहा जा सकता । जिस प्रकार आदमी जब किसी वस्तु को रात्रि में देखना चाहता है तब वह दीपशिखा के लिए यत्नवान् होता है । इस प्रकार दीपशिखा प्रथम उपादीयमान होने पर भी उपेयभूत वस्तु के दर्शन का उपाय होने के कारण अप्रधान है । २. निर्णयसागरीय संस्करण में 'प्रतिपत्तव्यस्य' पाठ माना है, किन्तु 'लोचन' के प्रस्तुत