ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम उद्योतः १०५ ध्वन्यालोकः अनेन वाच्यवाचकचारुत्वहेतुभ्य उपमादिभ्योऽनुप्रासादिभ्यश्च विभक्त एव ध्वनेर्विषय इति दर्शितम् । यदप्युक्तम्—‘प्रसिद्धप्रस्थाना- तिक्रमिणो मार्गस्य काव्यहानेर्ध्वनिर्नास्ति’ इति, तदप्ययुक्तम् । यतो लक्षणकृतामेव स केवलं न प्रसिद्धः, लक्ष्ये तु परीक्ष्यमाणे स एव सहृदय- हृदयाह्लादकारि काव्यतत्त्वम् । ततोऽन्यच्चित्रमेवेत्यग्रे दर्शयिष्यामः । इससे वाच्य और वाचक की चारुता के हेतु उपमा आदि और अनुप्रास आदि से ध्वनि का विषय विभक्त ही है, यह दिखाया । जो कि कहा है—‘प्रसिद्ध प्रस्थानों को अतिक्रमण करनेवाला मार्ग काव्यत्व से रहित होता है, अतः ध्वनि नहीं है।’ वह भी ठीक नहीं; क्योंकि लक्षणकारों के लिए ही वह केवल प्रसिद्ध नहीं है, लक्ष्य की परीक्षा करने पर वही सहृदयजनों के हृदय को आह्लादित करनेवाला काव्यतत्त्व है । उससे दूसरा ही ‘चित्र’ है, यह आगे चलकर दिखायेंगे । लोचनम् वम् । व्यङ्ग्यो वा ध्वन्यत इति व्यापारो वा शब्दार्थयोर्ध्वननमिति’ । कारिकया तु प्राधान्येन समुदाय एव काव्यरूपो मुख्यतया ध्वनिरिति प्रतिपादितम् । विभक्त इति । गुणालङ्काराणां वाच्यवाचकभावप्राणत्वात् । अस्य च तदन्यव्यङ्ग्य- व्यञ्जकभावसारत्वान्नास्य तेष्वन्तर्भाव इति । अनन्यत्र भावो विषयशब्दार्थः । एवं तद्व्यतिरिक्तः कोऽयं ध्वनिरिति निराकृतम् । लक्षणकृतामेवेति । लक्षण- (इस व्युत्पत्ति के अनुसार) व्यंग्य ‘ध्वनि’ है, और शब्द और अर्थ का व्यापार ‘ध्वननम्’ ( इस व्युत्पत्ति के अनुसार ) ‘ध्वनि’ है । कारिका द्वारा तो प्रधानतया समुदाय¹ ही काव्यरूप मुख्यरूप से ‘ध्वनि’ है, ऐसा प्रतिपादन किया है । विभक्त —। क्योंकि गुण और अलङ्कार का प्राणभूत तत्त्व वाच्यवाचकभाव है, और इस ध्वनि का सार उसके अतिरिक्त व्यंग्यव्यञ्जकभाव है, इसलिए इसका उनमें अन्तर्भाव नहीं है । ‘विषय’² शब्द का अर्थ है अन्यत्र सद्भाव का अभाव । इस प्रकार उन ( गुण और अलङ्कार ) से व्यतिरिक्त यह ‘ध्वनि’ क्या है, इसका निराकरण किया । लक्षणकारों के लिए ही—। १. मूल कारिकाग्रन्थ में जिस काव्य विशेष को ‘ध्वनि’ कहा गया है वह मुख्य रूप से रूढि द्वारा समुदाय रूप ध्वनि है । ‘ध्वनति’, ‘ध्वन्यते’ और ‘ध्वननम्’ शब्द, वाच्य, व्यङ्ग्य और व्यञ्जन इनका समुदाय यहाँ ‘ध्वनि’ है । पहले भी ‘लोचन’ में ध्वनि की व्युत्पत्तियों का निर्देश हो चुका है । २. व्युत्पत्ति के अनुसार ‘विषय’ शब्द का यह अर्थ है कि जो अपने सम्बन्ध के पदार्थ को बांध देता है, सीमित कर देता है ( विशेषण सिनोति बध्नातीति विषयः ) । प्रस्तुत में ध्वनि का भी अपनी सीमा से बाहर सद्भाव नहीं है, अर्थात् वह सीमा में बँधा हुआ है । अतः ध्वनि को उपमा आदि के अन्तर्गत नहीं लाया जा सकता है । उपमा आदि वाच्य और वाचक के चारुत्व के हेतु हैं किन्तु ध्वनि का प्राण व्यङ्ग्य-व्यञ्जक भाव है और यहाँ स्वयं यह चारुत्व की प्रतीति है ।