भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 172, कुल 680 में से

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पृष्ठ 172

११२ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् प्रतिषेध इवेष्टस्य यो विशेषाभिधित्सया । वक्ष्यमाणोक्तविषयः स आक्षेपो द्विधा मतः ॥ तत्राद्यौ यथा— अहं त्वां यदि नेक्षेय क्षणमप्युत्सुका ततः । इयद्देवास्त्वतोऽन्येन किमुक्तेनाप्रियेण ते ॥ इति वक्ष्यमाणमरणविषयो निषेधात्माक्षेपः । तत्रेयदस्त्वित्येतदेवात्र म्रिये इत्याक्षिप्तच्चारुत्वनिबन्धनमित्याक्षेपेणाक्षेपकमलङ्कृतं सत्प्रधानम् । उक्तवि- षयस्तु यथा ममैव— भो भोः किं किमकाण्ड एव पतितस्त्वं पान्थ कान्‍या गति- स्तत्तादृक्तृषितस्य मे खलमतिः सोऽयं जलं गूहते । अस्थानोपनतामकालसुलभां तृष्णां प्रति क्रुध्य भो- स्त्रैलोक्यप्रथितप्रभावमहिमा मार्गः पुनर्मारवः ॥ अत्र कश्चित्सेवकःप्राप्तः प्राप्तव्यमस्मात्किमिति न लभ इति प्रत्याशाविशास्य- मानहृदयः केनचिदमुनाक्षेपेण प्रतिबोध्यते । तत्राक्षेपेण निषेधरूपेण विशेष कथन की इच्छा से इष्ट वस्तु का प्रतिषेध-सा किया जाय तो वह 'वक्ष्यमाण- विषय' और 'उक्तविषय' के भेद से दो प्रकार का 'आक्षेप' होता है । उसमें पहला जैसे— 'यदि उत्सुक मैं क्षण भर भी तुझे न देखूँ तब···इतना ही रहने दो, इसके बाद की दूसरी तेरी अप्रिय बात कहने से क्या लाभ ?' यह वक्ष्यमाण मरणविषय निषेधरूप आक्षेप है । 'इतना रहने दो' केवल यही यहाँ 'मर जाऊँगी' इस बात को आक्षिप्त ( व्यञ्जित ) करता हुआ चारुत्व का निबन्धन ( आधार ) है । इस प्रकार आक्षेप्य द्वारा आक्षेपक अलंकृत होता हुआ प्रधान ठहरता है । 'उक्तविषय', जैसे मेरा ही— 'हे हे पथिक ! तुम क्यों गलत जगह में आ पहुँचे ?' 'मुझे ऐसी प्यास ही लगी है, मैं क्या करता ?' यह दुष्ट मार्ग तो जल को छिपा लेता है !' अरे गलत जगह में उत्पन्न हुई अकाल सुलभ मेरी तृष्णा के प्रति क्रोध करो, अन्यथा ( किसे नहीं मालूम कि ) यह तीनों लोकों में प्रसिद्ध प्रभाव और महिमा वाला मरु का मार्ग है ( यहाँ जल की आशा व्यर्थ है ) ।' यहाँ कोई सेवक अपने मालिक के पास पहुँचा है, इस प्रत्याशा से कि क्यों नहीं इससे वह अपने प्राप्तव्य का लाभ करेगा ? उसका हृदय विश्वास कर रहा है, तभी कोई उसे इस 'आक्षेप' के द्वारा प्रतिबोधन करता है । वहाँ निषेधरूप आक्षेप के द्वारा मुखचुम्बनादि व्यापार को शशी में आरोपित किया है । यदि एकशेष कर दिया जायगा तब इस प्रकार नायिका और नायक के शशी और निशा में व्यवहार के समारोपण का स्पष्टीकरण नहीं हो सकेगा ।