भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 680 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 227

प्रथम उद्योतः १६७ ध्वन्यालोकः कस्यचिद् ध्वनिभेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम् । वह ध्वनि के किसी भेद का उपलक्षण हो सकती है। लोचनम् ननु मा भूद् ध्वनिरिति भक्तिरिति चैकं रूपम्। मा च भूद्भक्तिर्ध्वनेर्लक्षणम्। उपलक्षणं तु भविष्यति; यत्र ध्वनिर्भवति, तत्र भक्तिरप्यस्तीति भक्त्युपलक्षितो ध्वनिः। न तावदेतत्सर्वत्रास्ति, इयता च किं परस्य सिद्धं ? किं वा नः त्रुटितम् ? शङ्का है कि ध्वनि और भक्ति दोनों एकरूप न हों और 'भक्ति' ध्वनि का लक्षण भी न हो, परन्तु उपलक्षण तो होगी ? जहाँ ध्वनि है वहाँ भक्ति भी है, इस प्रकार ध्वनि भक्ति से उपलक्षित है । ( इसका उत्तर देते हुए कहते हैं कि ) यह ( उपलक्षण ) अभिधेयेन सामीप्यात् संयोगात्समवायतः । वैपरीत्यात् क्रियायोगाल्लक्षणा पञ्चधा मता ॥ इस प्रकार 'शिखरिणि०' इस श्लोक में आकस्मिक प्रश्न-विशेष आदि रूप बाधक को लेकर सादृश्य से लक्षणा होगी, ऐसी स्थिति में लक्षणा या भक्ति को विवक्षितान्यपरवाच्य रूप में ध्वनि के स्थल में भी व्याप्त होने पर अव्याप्ति न होगी । इस पर 'लोचनकार' ने विशेष रूप से अन्त में यह कहा है कि यहाँ यद्यपि मुख्यार्थ का बाध सम्भव है किन्तु सहृदय को उसकी अपेक्षा ही नहीं होती, बल्कि वे लोग यहाँ वक्ता के—चाटु प्रीति रूप अभिप्राय को ही यहाँ विदित करते हैं। अतः यहाँ लक्षणा के प्रसंग की कल्पना अनावश्यक है। असल में ध्वनि के जिस स्थल में लक्षणा का कोई सम्पर्क सम्भावित नहीं, वह है असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य, अर्थात् रसादि ध्वनि । काव्य द्वारा विभावानु- भाव का जो प्रतिपादन होता है वहाँ रंचमात्र भी बाधक का अनुप्रवेश नहीं। ऐसी स्थिति में 'भक्ति' रूप लक्षण अपने लक्ष्य में प्राप्त न होने से अव्याप्त होगा । तब मीमांसक-पक्ष से शङ्का करते हैं, कि हमें 'लक्षणा' पूर्वोक्त स्वरूप की मान्य नहीं, बल्कि, लक्षणा अभिधेय की अविनाभूतप्रतीति है। अर्थात् अभिधेय के साथ किसी न किसी सम्बन्ध से सम्बद्ध की प्रतीति ही लक्षणा है। इस प्रकार अभिधेय रूप विभाव-अनुभाव के अविनाभूत रसादि लक्षणा का विषय होंगे। फिर यह समस्या नहीं जाती है कि असंलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य में लक्षणा की प्राप्ति नहीं है । उसके उत्तर में आचार्य ने पहले 'लक्षणा' के इस लक्षण का ही खण्डन किया । उनके अनुसार जब अभिधेय की अविनाभूतप्रतीति ही लक्षणा होगी तब तो 'धूम' शब्द से धूम के ज्ञान होने पर उससे अविनाभूत अग्निस्मृति को भी आप लक्षणा का कार्य ही स्वीकार करेंगे और तत्पश्चात् अग्नि से शीतापनोदन की स्मृति को भी 'धूम' का शब्दार्थ मानेंगे, इस प्रकार इतने शब्दार्थों की कल्पना करनी पड़ेगी कि जिसका कोई अन्त नहीं । अन्ततोगत्वा आपको मुख्यार्थ बाध को लक्षणा का बीज मानना ही पड़ेगा। इस प्रकार विभाव आदि में बाधक का अभाव होने से लक्षणा का सम्पर्क नहीं है, यह बात तदवस्थ रहती है ।