भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

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पृष्ठ 231

प्रथम उद्योतः १७१ ध्वन्यालोकः यत्त्वं तत्सर्वेषामेव वस्तूनां तत्तत्सक्तम्। यदि पुनर्ध्वनेरतिशयोक्त्यानया काव्यान्तरातिशायि तैः स्वरूपमाख्यायते तत्तेऽपि युक्ताभिधायिन एव॥ वचनीयत्व है तब तो वह (अनिर्वचनीयत्व) समग्र वस्तुओं के सम्बन्ध में प्राप्त है। पुनः यदि वे लोग इस अतिशयोक्ति द्वारा ध्वनि का कोई दूसरे काव्यों से बढ़ कर स्वरूप कहते हैं तो वे भी ठीक ही कहते हैं। इति श्रीराजानकानन्दवर्धनाचार्यविरचिते ध्वन्यालोके प्रथम उद्योतः॥ लोचनम् वृत्तिकृदत्रैवोद्द्योते मूलविभागमवोचत्—‘स च द्विविधः’ इति। सर्वेषामिति। लौकिकानां शास्त्रीयाणां चेत्यर्थः। अतिशयोक्त्येति। यथा ‘तान्यक्षराणि हृदये किमपि स्फुरन्ति’ इतिवदतिशयोक्त्यानाख्येयतोक्ता साररूपतां प्रतिपादयितु- मिति दर्शितमिति शिवम्॥ १९॥ किं लोचनं विनालोको भाति चन्द्रिकयापि हि। तेनाभिनवगुप्तोऽत्र लोचनोन्मीलनं व्यधात्॥ मूल का विभाग कहा है—‘स च द्विविधः’ (‘और वह दो प्रकार का है’)। समग्र वस्तुओं का—। अर्थात् लौकिक एवं शास्त्रीय वस्तुओं का। अतिशयोक्ति द्वारा—। जैसे—‘तान्यक्षराणि हृदये किमपि स्फुरन्ति’ (‘वे अक्षर हृदय में कुछ स्फुरित हो रहे हैं) इसके समान अतिशयोक्ति द्वारा साररूपता के प्रतिपादनार्थ अनाख्येयता (अनिर्वचनीयत्व) कही गई है, यह दिखाया गया। (शिवम्) क्या लोचन के बिना लोक (संसार) चन्द्रिका से भी उद्भासित होता है? (व्यङ्ग्य यह कि क्या ‘लोचन’ व्याख्या के बिना आलोक—ध्वन्यालोक—‘चन्द्रिका’ व्याख्या से स्फुरित होता है?) उस कारण अभिनवगुप्त ने यहाँ ‘लोचन’ का उन्मीलन किया है। किया जाय तो आपके सामने क्या प्रमाण होगा? आपको विवश होकर प्रकरण को स्वीकार करके ही इसका अर्थ करना होगा। अतः ‘वाक्यभेद’ की बात दोषपूर्ण है। रसास्वाद की स्थिति में लौकिक स्थितियों की भाँति पूर्वापर-काल की चिन्ता नहीं होती, वह सर्वथा अलौकिक स्थिति है। जैसा कि वृत्तिकारने सामान्यतः ‘विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि’ में भक्ति के अभाव का निर्देश किया है उस पर लोचनकार कहते हैं कि माना कि विवक्षितान्यपरवाच्य के संलक्ष्यक्रम रूप भेद में लक्षणा को हम किसी प्रकार स्वीकार कर भी लें, किन्तु रसादि रूप अलक्ष्यक्रम में क्या उपाय निकालैंगे और यदि अपना हठ छोड़ कर वादी आचार्य की बात सुने तो वह भी कहते हैं कि