भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 680 में से

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पृष्ठ 233

द्वितीय उद्योतः ध्वन्यालोकः एवमविवक्षितवाच्यविवक्षितान्यपरवाच्यत्वेन ध्वनिद्विप्रकारः प्रका- शितः । तत्राविवक्षितवाच्यस्य प्रभेदप्रतिपादनायेदमुच्यते— इस प्रकार अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य के रूप से ध्वनि दो प्रकार से प्रकाशित है । उनमें अविवक्षितवाच्य के प्रभेद के प्रतिपादन के लिए यह कहते हैं— लोचनम् या स्मर्यमाणा श्रेयांसि सूते ध्वंसयते रुजः । तामभीष्टफलोदारकल्पवल्लीं स्तुवे शिवाम् ॥ वृत्तिकारः सङ्गतिमुद्द्योतस्य कुर्वाण उपक्रमते—एवमित्यादि । प्रकाशित इति । मया वृत्तिकारेण सतेति भावः । न चैतन्मयोत्सूत्रमुक्तम्, अपि तु कारि- काकाराभिपायेणोत्याह—तत्रेति । तत्र द्विप्रकारप्रकाशने वृत्तिकारकृते यन्निमित्तं बीजभूतमिति सम्बन्धः । यदि वा—तत्रेति पूर्वशेषः । तत्र प्रथमोद्द्योते वृत्तिका- रेण प्रकाशितः अविवक्षितवाच्यस्य यः प्रभेदोऽवान्तरप्रकारस्तत्प्रतिपादनाये- दमुच्यते । तदवान्तरभेदप्रतिपादनद्वारेणैव चानुवादद्वारेणाविवक्षितवाच्यस्य यः प्रभेदो विवक्षितान्यपरवाच्यात्प्रभिन्नत्वं तत्प्रतिपादनायेदमुच्यते । भवति जो शिवा (शिव की शक्ति) [लोगों द्वारा] स्मर्यमाण होकर कल्याणों को उत्पन्न करती है और आपदाओं को नष्ट करती है उस अभीष्ट फल की उदार कल्पलता को स्तवन करता हूँ । वृत्तिकार उद्योत की सङ्गति बैठाते हुए आरम्भ करते हैं—इस प्रकार— । इत्यादि । प्रकाशित— । भाव यह कि मैंने वृत्तिकार के रूप में (ध्वनि के दो प्रकारों को प्रकाशित किया है) । मैंने इस सूत्र (कारिका) की सीमा के बाहर होकर नहीं कहा है, बल्कि कारिकाकार के अभिप्राय से कहा है—वहाँ— । सम्बन्ध (पूर्वापर की संगति) यह है कि वृत्तिकार द्वारा ध्वनि के दो प्रकारों के प्रकाशन में जो निमित्त है या बीजभूत है (उसे कहते हैं) । अथवा—'वहाँ' यह प्रथम उद्योत में कहे हुए का शेष है । वहाँ प्रथम उद्योत में वृत्तिकार ने अविवक्षित वाच्य का जो प्रभेद (विवक्षितान्यपरवाच्य से भिन्नत्व) प्रकाशित किया था उसके अवान्तर प्रकार के प्रतिपादनार्थ यह कहते हैं । उसके अवान्तर भेद के प्रतिपादन के द्वारा ही और अनुवाद के द्वारा अविवक्षित वाच्य का जो प्रभेद अर्थात् विवक्षितान्यपरवाच्य से प्रभिन्नत्व है, उसके प्रतिपादन के लिए यह कहते हैं । भाव यह कि मूलरूप से दो भेद होना