ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७० सलोचन-ध्वन्यालोकः
लोचनम् फलपर्यन्तताम् । एवमार्त्तिसहिष्णूनां विप्रलम्भभीरूणां प्रेक्षापूर्वकारिणां तावदेवं कारणोपादानम् । ता एवंविधाः पञ्चावस्थाः कारणगता मुनिनोक्ताः— संसाध्ये फलयोगे तु व्यापारः कारणस्य यः । तस्यानुपूर्व्या विज्ञेयाः पञ्चावस्थाः प्रयोक्तृभिः ॥ प्रारम्भश्च प्रयत्नश्च तथा प्राप्तेश्च सम्भवः । नियता च फलप्राप्तिः फलयोगश्च पञ्चमः ॥ इति । एवं या एताः कारणस्यावस्थास्तत्सम्पादकं यत्कर्त्तुरितिवृत्तं पञ्चधा विभक्तम् । त एव मुखप्रतिमुखगर्भावमर्शनिर्वहणाख्या अन्वर्थनामानः पञ्च सन्धय इतिवृत्तखण्डाः, सन्धीयन्त इति कृत्वा । तेषामपि सन्धीनां स्वनिर्वाहं प्रति तथा क्रमदर्शनादवान्तरभिन्ना इतिवृत्तभागाः । सन्ध्यङ्गानि-‘उपक्षेपः परिकरः परिन्यासो विलोभनम्' इत्यादीनि । अर्थप्रकृतयोऽत्रैवान्तर्भूताः । तथा हि स्वायत्तसिद्धेर्बीजं बिन्दुः कार्यमिति तिस्रः। बीजेन सर्वव्यापाराः बिन्दुनानुसन्धानं कार्येण निर्वाहः सन्दर्शनप्रार्थना- व्यवसायरूपा ह्येतास्तिस्रोऽर्थसम्पाद्ये कर्तुः प्रकृतयः स्वभावविशेषाः । स चवा- यत्तसिद्धित्वे तु सचिवस्य तदर्थमेव वा स्वार्थमेव वा स्वार्थमपि वा प्रवृत्तत्वेन मानता, प्रतिपक्षता (प्रतिकूलता) के न रहने पर बाधक के बाधन द्वारा सुदृढ़ फल- पर्यन्तता । इस प्रकार कष्ट के सहिष्णु, विप्रलम्भ (कार्य की असिद्धि) के भीरु, समझ- बूझकर कार्य करने वालों के कारणों का उपादान है। उन इस प्रकार के कारणगत पांच अवस्थाओं को मुनि ने कहा है— फलयोग के साध्य होने में कारण का जो व्यापार है उसकी आनुपूर्वी से पांच अवस्थाएं प्रयोक्ताओं को जाननी चाहिएँ—आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्ति का सम्भव, नियत फलप्राप्ति और फलयोग । (भरतनाट्य० २१, ७, ९) इस प्रकार जो ये कारण की अवस्थाएं हैं उनको सम्पन्न करने वाला जो कर्ता का इतिवृत्त है वह पांच प्रकार से विभक्त है। वे ही मुख, प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श, निर्वहण नामक यथार्थ नामों वाली पांच 'सन्धियां' इतिवृत्त-खण्ड हैं, 'सन्धान की जाती हैं' यह (व्युत्पत्ति) करके । उन सन्धियों के भी स्वनिर्वाह (फल) के प्रति उस प्रकार क्रम देखने से अवान्तरभिन्न इतिवृत्त-भाग हैं। सन्धि के अङ्ग—उपक्षेप, परिकर, परिन्यास, विलोभन इत्यादि । अर्थप्रकृतियां इसी में अन्तर्भूत हैं। जैसा कि अपने अधीन सिद्धि वाले (कर्ता) की बीज, बिन्दु और कार्य ये तीन हैं। बीज से समस्त व्यापार, बिन्दु से अनुसन्धान और कार्य से निर्वाह विवक्षित हैं, सन्दर्शन, प्रार्थना, व्यवसाय रूप ये तीन सम्पाद्य अर्थ में कर्ता की प्रकृतियां अर्थात् स्वभावविशेष हैं। परन्तु (कर्ता अर्थात् नायक के) सचिव के अधीन सिद्धिवाला होने पर सचिव के उसके (कर्ता के) लिए अथवा अपने लिए अथवा अपने लिए भी प्रवृत्त होने पर प्रकीर्ण और प्रसिद्ध होने के कारण प्रकरी, पताका