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ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 505, कुल 680 में से

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पृष्ठ 505

तृतीय उद्योतः ४४५ ध्वन्यालोकः रसादिरूपत्वमिति। नैवम्; यतो यथा जात्यत्वेन प्रतिभासमाने रत्ने रत्नस्वरूपानतिरिक्तत्वमेव तस्य लक्ष्यते तथा रसादीनामपि विभावा- नुभावादिरूपवाच्याव्यतिरिक्तत्वमेव लक्ष्येत । न चैवम्; न हि विभावानुभावव्यभिचारिण एव रसा इति कस्यचिदवगमः । अत एव च विभावादिप्रतीत्यविनाभाविनी रसादीनां प्रतीतिरिति तत्प्रतीत्योः पत्ता विशेष द्वारा संवेद्य है । ( किन्तु ) ऐसा नहीं; क्योंकि जिस प्रकार जात्यत्व रूप से प्रतिभासमान रत्न में उस ( जात्यत्व ) को रत्न के स्वरूप से अनतिरिक्तता लक्षित होती है उस प्रकार रसादि की भी विभाव, अनुभाव आदि रूप वाच्य से अव्यति- रिक्तता ही लक्षित होनी चाहिए । किन्तु ऐसा नहीं होता, क्योंकि किसी के ऐसी प्रतीति नहीं होती कि विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी ही रस हैं । और इसलिए विभावादि की प्रतीति की अविनाभाविनी रसादि की प्रतीति है, इस प्रकार उन लोचनम् वा स्युर्माणिक्यगतजात्यत्वसदृशा वा । न तावत्प्रथमः पक्षः, सर्वान् प्रति तथा- नवभासात् । नापि द्वितीयः, जात्यत्ववदनतिरिक्तत्वेनाप्रकाशनात् । एष च हेतुराद्येऽपि पक्षे सङ्गच्छत एव । तदाह—स्यान्मतमित्यादिना न चैवमित्य- न्तेन । एतदेव समर्थयति—न हीति । अत एव चेति । यतो न वाच्यधर्मत्वेन रसादीनां प्रतीतिः, यतश्च तत्प्रतीतौ वाच्यप्रतीतिः सर्वथानुपयोगिनी तत एव हेतोः क्रमेणावश्यं भाव्यं, सहभूतयोरुपकाराद्योगात् । स तु सहृदयभावना- भ्यासान्न लक्ष्यते अन्यथा तु लक्ष्येतापीत्युक्तं प्राक् । यस्यापि प्रतीतिविशेषा- त्मैव रस इत्युक्तिः, प्राक्तस्यापि व्यपदेशिवद्भाद्रसादीनां प्रतीतिरित्‍येवमन्यत्र । धर्म ) रूपादि के सदृश हैं अथवा माणिक्य में रहने वाले जात्यत्व के सदृश हैं । प्रथम पक्ष नहीं होगा, क्योंकि ( रसादि धर्म ) सब को उस प्रकार प्रतीत नही होते । दूसरा भी नहीं होगा, क्योंकि जात्यत्व की भांति अनतिरिक्त रूप से प्रकाशित नहीं होते । यह हेतु प्रथम पक्ष में संगत होता ही है । उसे कहते हैं—'यह कह सकते हैं' इत्यादि द्वारा 'ऐसा नहीं इस ( ग्रन्थ ) तक । इसी का समर्थन करते हैं—नहीं होती कि—। और इसलिए—। जिस कारण वाच्य के धर्म के रूप में रसादि की प्रतीति नहीं है और जिस कारण उस ( रसादि ) की प्रतीति में वाच्य की प्रतीति सर्वथा अनुपयोगिनी है उसी कारण से क्रम को अवश्य होना चाहिए । क्योंकि साथ में उत्पन्न होने वाले एक दूसरे का उपकार नहीं कर सकते । परन्तु वह क्रम सहृदयों की भावना के अभ्यास से नहीं लक्षित होता अन्यथा लक्षित भी होता यह पहले कह चुके हैं । पहले जिसकी भी यह उक्ति है कि रस प्रतीतिविशेष रूप ही है उसकी भी रसादि की प्रतीति ( 'राहु का सिर' की भांति ) व्यपदेशिवद्भाव ( भेदारोप ) से होगी । इसी प्रकार अन्यत्र भी ।