भारतकोश
ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary

आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished680 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 680 में से

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पृष्ठ 66

६ सलोचन-ध्वन्यालोकः लोचनम् रेवोच्छिन्ना भगवतीति परमेश्वरस्य तस्यामप्यवस्थायां परमकारुणिकत्वमुक्तं, किं च ते नखाः स्वच्छेन स्वच्छतागुणेन नैर्मल्येन; स्वच्छमृदुप्रभृतयो हि मुख्य- तया भाववृत्तय एव; स्वच्छायया च वक्रहृद्यरूपयाऽऽकृत्याऽऽयासितः-खेदित इन्दुर्यैः, अत्रार्थशक्तिमूलेन ध्वनिना बालचन्द्रत्वं ध्वन्यते, आयासनेन तत्स- न्निधौ चन्द्रस्य विच्छायत्वप्रतीतिरहृद्यत्वप्रतीतिश्च ध्वन्यते, आयासकारित्वं च आर्तिकारी (दुःखदायी) होने के कारण आर्ति का मूर्त रूप ही था, उसका विनाश करते हुये (नखों द्वारा) आर्ति ही उच्छिन्न की जाती है, इस प्रकार परमेश्वर का उस अवस्था में भी परमकारुणिकत्व कहा है ।१ और भी, वे नख स्वच्छ अर्थात् स्वच्छता गुण रूप निर्मलता के द्वारा, क्योंकि 'स्वच्छ' 'मृदु' प्रभृति शब्द मुख्य रूप से भाववृत्ति (स्वच्छता आदि धर्म के वाचक ही हैं; और अपनी छाया से, वक्र एवं हृद्य रूप आकृति से आयासित, खेदित (खेद को प्राप्त) इन्दु (चन्द्र) है जिनके द्वारा । यहाँ 'अर्थशक्तिमूलध्वनि' से इन्दु (चन्द्र) का बालत्व ध्वनित होता है । 'आयास पहुँचाने' से नखों के समीप चन्द्र के विच्छायत्व (कान्तिराहित्य) की प्रतीति १. 'नखों के प्रहरण' से आरम्भ करके इस अङ्कित स्थल तक 'वस्तुध्वनि' का निरूपण किया है । श्लोक में ऐसा नहीं कहकर कि मधुरिपु आप लोगों की रक्षा करें, कहा गया है कि मधुरिपु के नख आप लोगों की रक्षा करें, यद्यपि कि मधुरिपु के नख मधुरिपु से भिन्न नहीं, तथापि वे नख मधुरिपु से अपृथक् होने के कारण त्राण के कार्य में असाधारण कारण रूप से प्रस्तुत किये गये हैं, क्योंकि नख एक प्रकार के प्रहरण अर्थात् प्रहार के साधन, किंवा आयुध हैं, आयुध द्वारा अपनी या अन्य की रक्षा ही मुख्य रूप से कर्तव्य होती है। दूसरे यह कि नखों को त्राण का कर्ता बनाकर उनकी सातिशयशक्तित्ता अर्थात् अतिशय शक्तिमान् होना, सूचित किया है। तात्पर्य यह कि भगवान् मधुरिपु के नख स्वयं ही अपने आप में इस प्रकार पूर्ण सामर्थ्य रखते हैं कि त्राण कर सकें। इससे एक और 'वस्तु' यह भी ध्वनित होती है कि परमेश्वर को जगत के त्राण जैसे कार्य के लिए अपने से अतिरिक्त साधन (व्यतिरिक्त करण) की अपेक्षा नहीं, बल्कि उनका यह कार्य अपने ही शरीर के एक तुच्छ और साधारण तत्त्व नख से ही सम्पन्न हो जाता है । अब इसी प्रसंग में क्रम से श्लोक के विशेषणों से ध्वनित 'वस्तु' का प्रतिपादन करते हैं। स्वयं विशेष्यभूत विशेषण 'मधुरिपु' की व्यञ्जना है कि भगवान् जगत् को त्रस्त करने वाले मधु दैत्य आदि के शत्रु होकर जगत्त्रासापसारणार्थ निरन्तर उद्योगशील हैं, अर्थात् उनका यह स्वभाव ही है कि संसार के भय का निवारण करते रहें । 'अपनी इच्छाशक्ति से केसरी (सिंह) का रूप धारण किए हुए' इस विशेषण की व्यञ्जना के अनुसार उन पर न तो किसी प्रकार कर्म की परतन्त्रता है और न दूसरे किसी की इच्छा का दबाव है, बल्कि हिरण्यकशिपु जैसे विशिष्ट दानव, जिसने किसी समय, किसी स्थान पर तथा किसी व्यक्ति से न मारे जाने का वर प्राप्त कर लिया था, के हनन की उचित इच्छा के परिग्रह के औचित्य से ही जिन भगवान् मधुरिपु ने नरसिंह का स्वरूप धारण किया। नखों के विशेषण रूप में कहते हैं 'प्रपन्न जनों की आर्ति का छेदन करने वाले'; नख का उचित कार्य छेदन ही होता है । यद्यपि 'आर्ति' या पीड़ा का छेद्य होना सम्भव नहीं, तथापि परमेश्वर के स्वेच्छानिर्मित नखों द्वारा उसका छेद्य होना भी यहाँ असम्भाव्य नहीं समझना चाहिए । अथवा भगवान् के प्रपन्न प्रह्लाद आदि जनों के आर्तिप्रद होने के कारण आर्ति का मूर्त रूप उस हिरण्यकशिपु का नखों द्वारा छेदन ही यहाँ अभीष्ट है । इस प्रकार ऐसी