ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

ध्वन्यालोक (आचार्य आनन्दवर्धन - लोचन टीका एवं आचार्य जगन्नाथ पाठक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Dhvanyaloka of Anandavardhana with Abhinavagupta Locana and Hindi Commentary
आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished680 पृष्ठ
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वृत्तिग्रन्थ-पद्यसूची
| पृष्ठ | पृष्ठ | ||
|---|---|---|---|
| अ | उद्दामोत्कलिकां [ रत्नावली, २।४ ] | २४० | |
| अङ्कुरितः पल्लवितः | २९५ | उन्नतः प्रोल्लसद्धारः | २५९ |
| अज्जाएं पहारो गवलद्वाए | १५३ | उपोढरागेण विलोलतारकं [ पाणिनि ] | १०९ |
| अणत्त वच्च बालअ | ३८५ | उप्पहजाआएं असोहिणीएं | ५२४ |
| अतहट्ठिठए वि तहसण्ठिइए | ५६५ | ए | |
| अतिक्रान्तमुखाः कालाः [ ०महपिंन्यास ] | ३८३ | एकत्तो रुअइ पिआ | ४२२ |
| अत्ता एत्थ णिमज्जइ [ गाथा० ७।६७ ] | ७१ | एमेअ जणो तिस्सा | ३१६ |
| अनध्यवसितावगाहनं [ धर्मकीर्ति ] | ५२१ | एवं वादिनि देवर्षौ [ कुमारसं० ६।८४ ] | २६८, ५१३, ५६७ |
| अनवरतनयनजललव | ३४० | एहि गच्छ पतोत्तिट्ट [ व्यास ] | ४०८ |
| अनाख्येयांशभासित्वं | ५५६ | क | |
| अनिष्टस्य श्रुतिर्यद्वत् [ परिकर-श्लोक ] | ३२६ | कण्ठाच्छित्त्वाक्षमालवलय | ४२२ |
| अनुरागवती सन्ध्या | ११४, ४९४ | कथाशरीरसमुत्पाद्य [ परिकरश्लोक ] | ३६६ |
| अनौचित्यादृते नान्यत् [ आनन्दवर्धन ] | ३६२ | कपोले पत्राली करतलनिरोधेन | २३२ |
| अपारे काव्यसंसारे [ आनन्दवर्धन ] | ५३० | कमलाअराणं मलिआ | ३०४ |
| अमी से दृश्यन्ते ननु [ आनन्दवर्धन ] | ५२२ | करिणीवेहव्वअरो मह | ५६९ |
| अम्बा शेतेऽत्र वृद्धा | २७३ | कर्ता द्यूतच्छलानां [ वेणीसंहार ५।२६ ] | ५३७ |
| अयं स रशनोत्कर्षी [महा०, स्त्री, २४।१९] | ४१३ | कस्त्वं भोः कथयामि | ५२३ |
| अयमेकपदे तया वियोगः [विक्रमो० ४।३] | ३८५ | कः सन्नद्धे विरहविधुरां [ मेघदूत ] | ३१३ |
| अवसर रोउं चिअ | ३८५ | कस्स व ण होइ रोसो | ७६ |
| अव्युत्पत्तिकृतो दोषः [ परिकर-श्लोक ] | ३४६ | काव्याध्वनि ध्वनिः | ५३३ |
| अहिणअपओअरसिएसु | ५४९ | किमिव हि मधुराणां [अ० शाकु० १।१७] | ३१४ |
| अहो वनासि स्पृहणीयवीर्यः | ३८८ | किं हास्येन न मे प्रयास्यसि | २०३ |
| आ | कुविआओ पसन्नाओ | १५२ | |
| आक्रन्दाः स्तनितैर्विलोचन | २४६ | कृतककुपितैः [ रामाभ्युदय ] | ३३३ |
| आम असइओ ओरम | ५०९ | कृते वरकथालापे | ५६८ |
| आहूतोऽपि सहायैः [ मालवरुद्र ] | ११७ | कोपात्कोमल [ अमरुकशतक, ९ ] | २४७, ४०६ |
| इ | क्रामन्त्यः क्षतकोमलाङ्गुली | ४१४ | |
| इत्यक्लिष्टरसाश्रयोचित० [ आनन्दवर्धन ] | ६०० | ककार्यं शशलक्ष्मणः [ विक्रमो०, ४ ] | ४०५ |
| इत्यलक्ष्यक्रम्रा एव सन्तः | ४४६ | क्षिप्तो हस्तावलग्नः प्रसभ | २०६, ४०७ |
| ई | ख | ||
| ईसाकलुसस्स वि तुह | २९३ | खं येऽत्युज्ज्वलयन्ति [ आनन्दवर्धन ] | २६६ |
| उ | खणपाहुणिआ देअर | ५३५ | |
| उच्छिणसु पडिअ कुसुमं | ३०६ | ग | |
| उत्कम्पिनी भयपरि० [ तापसवत्सराज ] | ३३० | गअणं च मत्तमेहं | १८१ |
| ३६ ध्व० |