ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्राचीन ग्रंथोंमें लिखा है "राजाकी दंडनीति जब उत्तम चलती है तब कृतयुग आता है ।" "जिस राज्यमें दंड नहीं उस राज्यकी प्रजाका नाश होगा !" "दंड ही प्रजाको सही दिशा दिखाकर उसकी रक्षा करता है !" "ज्ञानी लोग कहते हैं दंड ही धर्म है।" "दंडसे लोगोंका रक्षण होता है" "बिना दंडके ब्रह्मचारी (विद्यार्थी) वेदाध्ययन (अध्ययन) नहीं करेंगे। गाय दूध नहीं देगी, लडकियोंके विवाह नहीं होंगे, समाजव्यवस्था टूट जायेगी !" कहीं कहीं राजनीतिको दंडशास्त्र कहा गया है। भारतीय समाज-शास्त्रमें कई प्रकारके दंड है। ब्रह्मचारी, विद्यार्थी-का मार्गदर्शक, प्रतीक रूप दंड, संन्यासीका इंद्रिय दमनात्मक दंड, इसके अलावा गुरुदंड, समाजदंड, राजदंड, और इन सबसे श्रेष्ठ आत्मानुशासनका ब्रह्मदंड। सर्वान्तर्यामी हृदयका दंड। जिसके लिये उपनिषदमें कहा गया है। मानो वह उठाया हुवा वज्र । उसके भयसे तपता अग्नि ॥ उसीसे प्रकाशता है भास्कर । करते अपने नियत कर्म ॥ यही आत्म-दंड मनुष्यको सदैव स्वतंत्र रखता है । सर्वत्र स्वतंत्र रखता है। क्यों कि इसके ऊपर दूसरा कोई दंड नहीं। इस दंडके भयसे मनुष्य जो बर्ताव करता है उसे देखकर दूसरे किसीको उस पर शासन करनेका, उसको दंड देनेका साहस ही नहीं हो सकता। जैसे अग्नि, वायु, सूर्य आदि पर कोई किसी प्रकारका शासन करनेका साहस नहीं करता । ज्ञानेश्वरी ८२