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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1034

अर्जुनसे "शिकार किसका ?" इस बात पर वाग्वाद हुआ । शिकार शास्त्रकी सैद्धांतिक चर्चाने उन दोनोंके द्वंद्व युद्धका रूप ले लिया । इस द्वंद्व युद्धमें अर्जुनने अपने पराक्रमका अनुत्तम प्रदर्शन किया । शिवजीने भी प्रसन्न होकर अर्जुनको पाशुपतास्त्र दिया । मिटाया निवात कवचको-प्रह्लादका छोटा भाई सम्हाद । उस सम्हादके दो पुत्र थे । उनका नाम था निवात और कवच । ये दोनों अत्यंत पराक्रमी थे । ये समुद्रके किनारे रहते थे । देव भी इनसे डरते थे । इंद्र भी इनको नहीं जीत सका था । इंद्रने इनको मारनेके लिये अर्जुनकी सहायता मांगी । अर्जुनको आवश्यक युद्ध-सामग्री दी । शस्त्रास्त्र दिये । ये राक्षस जैसे पराक्रमी थे वैसे मायावी थे । धोखा देनेमें सिद्धहस्त थे । फिर भी अर्जुनने बहुतही वीरता और कुशलतासे इन राक्षसोंको मारा । इस पर इंद्रने अपना आधा आसन देकर अर्जुनका सम्मान किया था । तथा हराया है गंधर्वोंको । पराक्रमसे ॥ ज्ञा० २-१० ॥ अर्जुनने कई बार कई गंधर्वोंको जीता है । लाक्षागृहसे बच निकलनेके बाद पांडव गुप्त रूपसे द्रौपदी स्वयंवरके लिये जा रहे थे । उसी समय रास्तेमें अंगारपर्ण नामका एक गंधर्व अपनी स्त्रियोंके साथ जल-क्रीड़ा कर रहा था । वहां एकांत स्थलमें पांडवोंको देखकर अंगारपर्णने उनको रोका “ऐसी अप-रात्रीमें तुम कहां जा रहे हो ?” पांडवोंने उसको समझानेका बहुतेरा प्रयास किया किंतु व्यर्थ गया । अंगारपर्ण पांडवोंका रास्ता रोकके खडा था । तब अर्जुनने अंगारपर्णको युद्धके लिये ललकारा । दोनोंमें जो द्वंद्व युद्ध हुआ उसमें अंगारपर्ण बुरी तरह हार गया और वह अर्जुनके पराक्रमको देखकर प्रसन्न भी हुआ । उसने अर्जुनको "चाक्षुषी विद्या" सिखाई । राजसूय यज्ञमें जब वह उत्तर दिग्विजयको गया था तब भी उसने गंधर्वरक्षित देशोंकी विजय यात्रा की और गंधर्वोंको जीता । तथा चित्रसेन गंधर्वको भी जीतकर उससे गीत-वाद्य-नृत्यकला सीखली जिसका उपयोग अर्जुनने अज्ञातवासमें विराट गृहमें बृहन्नला बनते समय हुआ । अर्जुनने बृहन्नला बनकर उत्तराको वह विद्या सिखाई थी । जिसकी कृपासे मिला वर । उसीसे मनमें अभिचार । ऐसा बनूं क्या मैं भस्मासुर । कहता अर्जुन ॥ ज्ञा० २-३८ ॥ मैं द्रोण पर शर-संधान कैसे करूं ? वह मेरे अग्र गुरु हैं-यह कहते समय अर्जुन पूछता है क्या मैं भस्मासुर बनूं ? भस्मासुर शिव-भक्त है । वह शिवजीके भस्मसे उत्पन्न हुआ था इसलिये भस्मासुर कहलाता है । इसने तप करके शिवजीको प्रसन्न कर लिया । प्रसन्न शिवजीने वर मांगनेको कहा । तमोगुणी असुर वर मांगेगा भी क्या मांगेगा ? उसने वर मांगा “मैं जिसके सिर पर हाथ रखुं वह जलकर राख हो जाय ।” शिवजीने कहा “तथास्तु ।” बस, वह जो मिले उसके सिर पर हाथ रखकर शक्ति प्रदर्शन करने लगा । एक बार नारद उसकी चपेटमें आ गये । नारद पर वह अपनी शक्ति-परीक्षण करने लगा । नारदने कहा "अरे मूर्ख ! मेरे सिर पर हाथ रखकर क्या मिलेगा ? कोई काम करते समय “इससे क्या लाभ होगा ?” यह देखकर करना चाहिये । यही बुद्धिमानीका लक्षण है। मेरे सिर पर हाथ न रखकर यदि शिवजीके सिर पर हाथ रखोगे तो शिवजी राख हो जायेंगे। तुमको कैलास पर्वतके साथ पार्वती जैसी सुंदर पत्नी मिलेगी !" ज्ञानेश्वरी ८८