ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहुष हुवा जो स्वर्गाधीश्वर । किंतु भूला वहांका व्यवहार । जिससे सर्प हुवा पृथ्वीपर । जानता है तू ॥ ज्ञा० १८-१४७९ ॥ पुरूरवाका पोता राजा नहुष । अत्यंत पराक्रमी । सद्गुणी । ब्रह्महत्याके पापके कारण जब इंद्रको इंद्रत्वसे हटना पड़ा तब देवऋषियोंने मिलकर नहुषको इंद्र बनाया । और नहुष "शानसे" रहने लगा । नहुषकी इस शानमें इंद्राणीकी न्यूनता खटकने लगी । इंद्रके साथ इंद्राणीका होना आवश्यक है । नहीं तो इंद्रपदकी शान कहां ? उसने तुरंत इंद्राणीको अंतःपुरमें आनेकी आज्ञा दी । इस आज्ञाने धर्म-संकटका काम किया । यह संकट टालनेके लिये इंद्राणीने अत्यंत चतुरतासे "कृपया अपूर्व वाहनमें बैठकर मुझे ले जानेके लिये पधारिये ।" ऐसा संदेश भेज दिया । अब नहुष अपूर्व वाहनका विचार करने लगा । वह सप्तऋषियोंको रथमें जोत कर उस "अपूर्व वाहन" में इंद्राणीको लानेके लिये जाने लगा । नहुषको जल्दीसे जल्दी वहां पहुंचनेकी पड़ी थी और बेचारे वृद्ध ऋषि रथ खींचकर जल्दी नहीं चल रहे थे । राजाने उनको “सर्प सर्प” जल्दी जल्दी कहते हुए लात मारना प्रारंभ किया । इस पर अगस्तिने क्रोधमें आकर शाप दिया कि "तू अब अजगर सर्पयोनिमें जा !” और नहुष रथमें ही अजगर बनकर भूमीपर गिर पडा । कोई पद मिलना कठिन नहीं किंतु योग्यता पूर्वक उसको संभालना कठिन है यह समझाते हुए ज्ञानेश्वर महाराजने ऊपरकी कथा कही है । अथवा यहु गीता सप्तशती । जो मंत्रप्रतिपाद्या भगवती । मोह-महिषासुरसे मुक्ती । आनंदती है ॥ ज्ञा० १८-१६८८ ॥ महिषासुर रंभासुरका पुत्र । घोर तपस्या करके इसने ब्रह्मदेवसे पुरुषसे मृत्यु न होनेका वर ले लिया । उसके बाद यह देवोंको तंग करने लगा । प्राणिमात्रका पीडन इसका कार्य । तब आदि शक्तिने उसको युद्धके लिये प्रवृत्त करके उसका वध किया । महिषासुरने आदि शक्तिको सामान्य स्त्री मानकर उसको मोहित करनेका प्रयत्न किया किंतु वह सब व्यर्थ था । श्रीगुरुके नामसे मृत्तिका । मूर्ति रख वनमें विद्याका । रोव कर डंका श्रेष्ठताका । बजाया भिल्लने ॥ ज्ञा० १८-१७३० ॥ हिरण्यधनु नामका एक भिल्ल-राज था । उसका पुत्र एकलव्य । वह अत्यंत बुद्धिमान् था । अस्त्र-विद्या सीखनेके लिये वह द्रोणाचार्यके पास गया । किंतु द्रोणाचार्यने वह भिल्ल होनेसे उसको अस्त्र-विद्या सिखाना अस्वीकार कर दिया । तब उसने द्रोणाचार्यकी पादुकाएं मांग लीं, वनमें जाकरके मिट्टीसे द्रोणाचार्य की एक मूर्ती बनायी और उसके सामने धनुर्विद्याका अभ्यास करने लगा । तथा इस अभ्यासमें वह इतना प्रवीण हुवा कि कोई भी उसकी समानता नहीं कर सकता था । द्रोणाचार्यका सर्व श्रेष्ठ शिष्य अर्जुन ! इसने भी एकलव्यकी श्रेष्ठता स्वीकार करली । ॐ ज्ञानेश्वरी १०२