भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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ऐसोंको रणमें मारना । फिर राज्य सुख भोगना । इसका विचार करना । हे असंभव ॥ ४५ ॥ दूभर है राज्य भोग भोगना । इंद्रपद भी ग्रहण करना । इससे अधिक भला है जीना । भिक्षान्नसे ही ॥ ४६ ॥ न तो देश-त्याग कर जाना । गिरी-कंदरामें जा बसना । करमें शस्त्र नहीं धरना । इनके सम्मुख ॥ ४७ ॥ पैने शस्त्रोंसे मर्म-स्थान । करना इनका भेदन । फिर इनके खूनमें सान । पाना भोगैश्वर्य ॥ ४८ ॥ रक्त-सिक्त वे ऐसे । भोग भोगना कैसे । न जंचे मुझे ऐसे । वचन तेरे ॥ ४९ ॥ दीन अर्जुनकी अनन्य शरणता— उस समयमें अर्जुन । कहता है कृष्ण तू सुन । किंतु वह न देता कान । सुन करके भी ॥ ५० ॥ यह जानकर चौंका अर्जुन । फिरसे बोला अपना वचन । देता नहीं तू देव अवधान । मेरी बात पर ॥ ५१ ॥ न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः । यानेव हत्वा न जिजीविषाम- स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥ ६ ॥ जो विचार मेरे मनमें । बोला मैं वह इस स्थानमें । अब है भला जो करनेमें । जाने वह तू ही ॥ ५२ ॥ होगी हमारी जय या उन्हींकी किसमें भलायी यही न जानूं । हत्यासे जिनके जीना न चाहूं वही खडे हैं युद्धार्थ डटके ॥ ६ ॥ ३७ सांख्ययोग