ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंज्ञानेश्वरीमें कहीं कहीं इन्हे षट्-विकार भी कहा गया है । अष्टांगयोग—आठ अंगोंसे बना हुवा योग । इसको पतंजल ऋषिने कहा था इसलिये पातंजल योग भी कहते हैं । वैसे ही यह सर्वश्रेष्ठ योग होनेके कारण राजयोग भी कहते हैं । इस योगके (१) यम (२) नियम (३) आसन (४) प्राणायाम (५) प्रत्याहार (६) धारणा (७) ध्यान (८) समाधि ये आठ अंग हैं । पहला अंग यम । यम पांच हैं । (१) अहिंसा-तन, मन, वचनसे किसीका द्वेष नहीं करना । किसीका बुरा न चाहना (२) सत्य, जिस बातको जब जैसे अनुभव किया हो तब वैसे कहना । यदि कहना ही पडता हो ! कोई बात कहते समय कोई हेतु मनमें रख कर नहीं कहना । जैसे कहा है वैसे बर्ताव करना । चिंतन मनन करना । (३) अस्तेय-किसीकी कोई वस्तु मनसे भी नहीं चुराना, चाहना । (४) ब्रह्मचर्य-सर्वत्र सदैव ब्रह्मचिंतनमें ही रत रहना, अन्य चिंतन नहीं करना (५) अपरिग्रह-संग्रहार्थ किसीसे कुछ भी नहीं लेना । दूसरा अंग नियम-जैसे यम पांच हैं वैसे नियम भी पांच हैं । (१) शौच-तन मन वचन शुद्धि । शरीर निरोग रखना । मन प्रसन्न रखना । वाणी पवित्र रखना । (२) संतोष-आशा निराशाके परे, अपनी इच्छा कुछ न रख कर, परमात्मेच्छासे जीना । तृष्णा त्यागसे संतोष मिलता है । (३) तप-सभी धर्मोंमें तपका महत्त्व गाया गया है । सदुद्देशकी सिद्धिके लिये नियम पूर्वक सतत-कार्यरत रहना तप है । (४) स्वाध्याय-जीवन लक्ष्यके सहायक सद्ग्रंथोंका वाचन, मनन, अथवा नामस्मरण उत्तम स्वाध्याय है । (५) ईश्वर प्रणिधान-“ इदं न मम ” भावनासे, जो कुछ है वह सब परमात्माका है यह मानकर सर्व समर्पणमय जीवन बिताना । तीसरा अंग आसन-विशिष्ट रीतिसे बैठा रहना । हठयोगमें ८४ आसन कहे गये हैं । उनमेंसे कई शरीर स्वास्थ्यके लिये हैं । किंतु अष्टांगयोगमें आसनका अर्थ सुस्थिर बैठनेके लिये है । इसके लिये भी सिद्धासन पद्मासन आदिका विचार किया गया है । किसी भी आसनमें बैठना हो सीधा बैठना चाहिये । चौथा अंग हे प्राणायाम-प्राणायामका अर्थ श्वासको नियमित करना है । प्राणायाम एक गहरा शास्त्र है । मानवशरीरमें अलग अलग काम करनेवाले पांच प्राण हैं । उन सबको नियमित करना है । इसके लिये पूरक-श्वास अंदर खींचना, कुंभक रोकना, रेचक-श्वास बाहर छोडना यह सामान्य नियम हैं । गुदद्वारसे श्वास खींचना, मूलबंध, प्राण और अपानका मिलन, श्वास अंदर रोकनेकी भांति अंदरका सारा श्वास बाहर निकाल कर उसको बाहर रोकना । उड्डियान बंध आदि कई प्रकार हैं । प्राणायामसे अनेक प्रकारके रोगोंका नाश होकर श्वासके विशिष्ट और विविध प्रकारके स्पंदनोंसे शरीरके विविध प्रकारके कोशोंको जगाकर कार्यक्षम करना इसका वास्तविक उद्देश्य है । प्राणायामसे अन्नमयकोश, प्राणमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश, तथा आनंद- मयकोशको जागृत कर सकते हैं । इसको हठयोगमें विज्ञान कहते हैं । अनुभवी गुरूसे ही इसका ज्ञान और अभ्यास हो सकता है । इस योगका पांचवा अंग है प्रत्याहार-पांच ज्ञानेंद्रियोंके पांच विषय हैं । (१) शब्द (२) स्पर्श (३) रूप (४) रस (५) गंध । पांच ज्ञानेंद्रियां इन पांच विषयोंके पीछे दौडनी १०९ परिशिष्ट ५