भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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चलितचित्तपानतुंदिल-चंचल चित्तको पी जानेसे जिसका पेट बढ गया है। चस्का- आदत, लत. चांग- मूल ज्ञानेश्वरीका शब्द, भला, अच्छा, हिंदी शब्द चंगा. चातुर्यकलाकामिनी-चातुर्य, कलाकी देवता सरस्वती. चित्कला- जीवनकला. चित्कलिक-ज्ञानरूपी ज्योति. चिद्गगनभुवनदीप- चैतन्यरूपी आकाश भवनका दीप. चिदंबर-चिदाकाश-चैतन्यरूपी आकाश चिद्रूप- चैतन्यरूप. चिद्भ्रमर- जीवचैतन्यरूप भ्रमर. चिन्हित- चिन्हयुक्त सांकेतिक. चिबुक- ठोडी. चेंड़वा- पक्षीका बच्चा. चौड- मुंडन, विनाश छ छकाना- भ्रमित करना, अचंवेमें आना. छतनार- छातासा छज्जेदार मंडप. ज जगडंबर- विश्व-विस्तार, विश्वकी प्रचंड व्यापकता. जगदखिलपालन- समग्रविश्वका पालन करनेवाला. जगदंबुदगर्भनभ- जगद्रूपी बादलका गर्भ जहां संभव हो सकता है ऐसा आकाश. जगदादिकंद- जगतका आदि कारण. जगदादिविश्रामधाम- जगत का उत्पत्ति- स्थान और विश्रांतिस्थान जगदुन्मिलना विरल- केलिप्रिय- जगतको बारबार प्रकट करनेवाले खेलमें रमनेवाला. जंगम- हलचल करनेवाला सचेत न प्राणी. जन्म- उत्पत्तिरूप प्रथम भाव विकार, दुःख हेतु. देह धारणरूप

आविर्भाव. सर्वसाधारण जीवका देहधारण. जन्मकर्म- न जन्मते जन्म लेना, न करने- का सा करना, ईश्वरका दिव्य जन्मकर्म. जनलीलाविलास- उत्पन्न करनेवाली लीलाका विलास करनेवाला. जन्मजराजलद्वालप्रभंजन- जन्म तथा वृद्धावस्थाके बोधके जालको नष्ट करनेवाला. जन्यजनक- उत्पन्न होनेवाला और उत्पन्न करनेवाला. जलकुंभी- काई-शेवार. पानीपर आनेवाली हरी काई. जल्पवाद- बेकारकी बकवाद. जलार्णव- प्रलयकालका सागर. जितेंद्रिय- जिन्होंने अपनी इंद्रियोंपर स्वामित्व प्राप्त किया है. जिव्हार- मर्मस्थान, जीव, जीवनाधार. जिव्हाला- आत्मीयता, अंतःकरण- मूल मराठी शब्द. जिज्ञासा- ज्ञानकी इच्छा. ईश्वर विषयक ज्ञानकी इच्छा. जीव- अंतःकरण, आत्म-स्वरूप, प्राणी, अंतरात्मा, देहाभिमानी क्षेत्री. जीवत्व- जीवपन, साहंकार की भूमिका. जोड़- आचरण, पान, अभ्यास, साधना, ईश्वरसंलग्नता, जन्मतः साथ लेना, सफल मनोरथ होता, साथ रहना जुट जाना. जीवन- जीना. ज्ञाता- जाननेवाला, तत्वज्ञ, विचारक, आत्मज्ञानी, ज्ञानत्रिपुटी में एक. ज्ञान- अवबोध, बुद्धिमत्ता, तत्वचिंतन, विवेक, आत्मविषयक बोध. ईश्वरका दिव्य जन्मकर्म जानना, आत्मानारमशान, कार्या-

ज्ञानेश्वरी २०६