ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्तवन- स्तुति. स्ताव्य- स्तुतिका विषय. स्तोत्र- स्तुति, ईश्वर-स्तवनार्थ बनायेगये विशिष्ट प्रकारके काव्य. स्थावर- अचल हलचल न कर सकनेवाला स्थित- स्थिर, अस्तित्व, अपने स्थान पर अधिष्ठित, स्वप्रमाणपर जमा हुवा. स्थितप्रज्ञ- जिसकी बुद्धि समाधिमें स्थिर है वह, आदर्श-सिद्धांत तथा उसके व्यवहार-कुशलतामें जो प्रवीण है ऐसा, सभी इच्छाओंका अतिक्र- मण करके अपनेमें अपनेसे निरा- लंब आनंदमे स्थिर है वह, गीताका आदर्श पुरुष. स्नेहाद्रंचित्त-स्नेह वात्सल्यपूर्ण चित्त. स्फुरदमंदामंदवत्सल-सदैव स्फुरनेवाले आनंदसे भरा हुवा. स्वजनवनचंदन-अपने भक्तोंके समूहमें चंदनरूप. स्वसंविद्रुमबीजप्रसभूमिरूप स्वसंवित् रूप स्वरूपज्ञानरूपी वृक्षका बीज पडने योग्य भूमिरूप. स्वसंवेद्य अपने आप जानने योग्य. ह हडप — मूल शब्द कन्नड भाषाका, क्षौर सामग्री रखनेका नाईका थैला. किंतु महाराष्ट्रमें इसको पानदानके रूपमें स्वीकार किया गया है. हरना- हरण करना, दूर करना, फैलाना, पीछे हटाना.
हरित-हरे रंगका. हर्ष-आनंद. हवि-हवनद्रव्य. हस्तोदक-हाथपर पानी छोड़कर दान देना, हतोदक देना. हिमवंत-हिमाचल. हिय-हृदय. हृदयकमल आराम-हृदयरूपी कमलमें विश्रांति लेनेवाला. हृदयस्थ-हृदयमें रहनेवाला. हेतुमंत-युक्तित्राला. क्ष क्षमा-सहनशीलता अपराध, सहिष्णुता. क्षय- मरण, नाश क्षर- नाशवंत. क्षितीश- राजा. क्षीण- क्षय होनेवाला, समाप्त होनेवाला. क्षीरसागर- दूध का सागर. क्षीरार्णवकल्लोल-लहरानेवाले दूध-सागरका कल्लोल. क्षुद्रघंटिका- घुंगरू. क्षुब्ध- चंचल, अधीर, क्रुद्ध, भीत. क्षेत्र- खेत, मैदान, पवित्रस्थान, गीतामें जीवात्माका क्षेत्र शरीर, भूतोंका उत्पत्तिस्थल. क्षेत्रसंन्यास- स्थान निष्ठा संन्यास, यह अंतिमस्थान स्थान है इस भावसे एकही स्थान पर रहनेका निश्चय और प्रयत्न करना. क्षेत्रसंन्यासी- क्षेत्रसंन्यास लिया हुवा. क्षेत्रज्ञ- शरीररूप क्षेत्रका साक्षीरूप जीव. क्षेम- मोक्ष विषयक उपलब्धीका रक्षण.
ॐ ज्ञानेश्वरी २२४