ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसलिये तू जान अर्जुन । ये हैं सुख दुखके कारण । न जाने देना अंतःकरण । इसमें कभी ॥ ५८ ॥ गुणत्रयोंका कर अनादर । मैं मेरा ऐसा कभी न कर । केवल आत्म-सुखका अंतर । कर आश्रय ॥ ५९ ॥ यावानर्थ उदपाने सर्वतः संप्लुतोदके । तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः ॥ ४६ ॥ तू निष्काम कर्म कर- वेद यदि अनेक बोलते । विविध भेदोंको है सुझाते । अपना हित आप देखते । उसमेंसे ही ॥ २६० ॥ जैसे सूर्यका उदय होते । सारे पथ दिखायी पड़ते । किंतु सभी पथ क्या चलते । कहो मुझे ॥ ६१ ॥ या जलमय सकल । हुआ सभी महीतल । लेते हम जो केवल । आवश्यक ॥ ६२ ॥ वैसे ही ज्ञानी जन । कर वेदार्थ चिंतन । शाश्वत जो तत्व-ज्ञान । स्वीकारते हैं ॥ ६३ ॥ कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ ४७ ॥ इसीलिये सुन तू अर्जुन । करके ऐसे अवलोकन । तुझे यह उचित है जान । जो स्वकर्म ॥ ६४ ॥ विचार किया हमने पूर्ण । यह हमारा निश्चय जान । अनुचित त्यजना अर्जुन । विहित कर्म ॥ ६५ ॥ सभी ओर भरा पानी कुएंमें क्या धरा रहा । ब्रह्मज्ञ-तत्वज्ञानीको वेदोंमें सार जो रहा ॥ ४६ ॥ कर्मका अधिकारी तू न कर फल-कामना । न कर्म-फलमें हेतु न हो राग अकर्ममें ॥ ४७ ॥ ६१ सांख्ययोग