ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोता है वही निरुपाधि । उसे जान तू स्थिर-बुद्धि । वही होता है निरवधि । मुणीश्वर ॥ ५६ ॥ आपूर्यमाणं अचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशंति यद्वत् । तद्वत् कामा यं प्रविशंति सर्वे स शांतिमाप्नोति न कामकामी ॥७०॥ सभी सुख-समुद्र उसमें लीन-- अर्जुन और एक प्रकार । उसको जाननेका विचार । शांत रहता जैसा सागर । अखंडित ॥ ५७ ॥ सरिता ओघ यदि समस्त । करते हैं जल समर्पित । तो भी रहता जैसे सीमित । अपनी सीमामें ॥ ५८ ॥ अथवा ग्रीष्मकालमें सरिता । सुखालेती है प्रवाह सर्वथा । किंतु उसमें न्यून नहीं आता । समुद्र वैसाही ॥ ५९ ॥ वैसे ही पानेसे ऋध्दि सिद्धि । नहीं क्षोभती उसकी बुद्धि । न मिलनेसे उसकी बुध्दि । न होती उदास ॥ ३६० ॥ अथवा सूरजके समीप । प्रकाश लगाते क्या दीप । होता क्या, न लगानेसे दीप । अंधार वहां ॥ ६१ ॥ ऋध्दि सिद्धिका उसपर । न होता कुछ भी असर । हियमें होती निरंतर । शांति उसके ॥ ६२ ॥ मानता जो अपना वैभव महान । उसके सम्मुख तुच्छ इंद्र भुवन । वह करें क्या पर्ण-कुटिमें रंजन । भिल्लोंकी ॥ ६३ ॥ न भंग पाता भर भी सदैव समुद्र है नीर सभी पचाता । वैसे पचाते सब काम भोग वे शांति पाते नहीं भोग-लुब्ध ॥७०॥ ७३ सांख्ययोग (10)