भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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आत्महित और लोकहितार्थ कर्म— तृप्ति हुई है जिसकी । साधना मिटी उसकी । बात आत्म-संतोषकी । कर्ममें नहीं ॥ ४८ ॥ जब तक है अर्जुन । आत्म-बोध न लेता मन । तब तक है साधना । रहती ही ॥ ४९ ॥ तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर । असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः ॥१९॥ इसीलिये तू नियत । सभी कामना रहित । होकर कर उचित । स्वधर्माचरण ॥ १५० ॥ स्वकर्ममें निष्कामता । अनुकरण किया पार्थ । उन्होंने पाया है तत्वता । कैवल्यधाम ॥ ५१ ॥ कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥२०॥ देख तू जानकादिक । कर्मजात है अशेष । न छोड़के मोक्ष सुख । पाये यहां ॥ ५२ ॥ इस कारणसे पार्थ । करना कर्ममें आस्था । और भी एक है अर्थ । उपकारक ॥ ५३ ॥ अपने आचरण करनेसे । होगा अनुकरण जिससे । कर्म लोपकी विपदासे । बचेगा विश्व ॥ ५४॥ जिसने पाया जो पानेका । बीज भी मिटा कामनाका । फिर भी कर्तव्य उनका । रहा औरोंकेलिये ॥ ५५ ॥ तथैव नित्य निःसंग कर कर्तव्य कर्म तू । निःसंग करके कर्म कैवल्य पद लाभता ॥ १९ ॥ प्राप्त की है कर्मसे ही संसिद्धि जनकादिने । कर तू कर्म जो योग्य लोक-संग्रहकेलिये ॥ २० ॥ ९१ कर्मयोग