ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहोना है वे स-कोमल समान । एकसे सहज रखना जान । रचना करें एकसी समान । भूमिपर ॥ ८३ ॥ थोड़ा भी यदि वह ऊंचा होगा । उससे शरीर अस्थिर होगा । थोड़ासा यदि वह नीचा होगा । आयेगा भूमि दोष ॥ ८४ ॥ इसीलिये ऐसा न करना । आसन सम भावका होना । ऐसा आसन तैयार करना । धनुर्धर ॥ ८५ ॥ तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः । उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥ १२ ॥ योग-साधनाका प्रारंभ ऐसा करना— करना प्रारंभ अनुष्ठान । एकाग्र कर अंतःकरण । करके श्री गुरुका स्मरण । अनुभवसे ॥ ८६ ॥ ऐसे स्मरणके आदरसे । अहंकारके घुल जानेसे । भर जाता है सात्विकतासे । साधक वहां ॥ ८७ ॥ वासनाका विस्मरण होता । इंद्रियोंका चांचल्य मिटता । वैसेही तब स्थिरत्व आता । अंतःकरणमें ॥ ८८ ॥ संतुलन ऐसा स्वाभाविक । होने तक रुके क्षण एक । बैठो इस बोधमें क्षणिक । आसन पर ॥ ८९ ॥ अंग ही अंगको सचेत करता । जैसे पवनको पवन करता । वैसे अनुभवोंका उदय होता । ऐसे समय ॥ १९० ॥ प्रवृत्ति मुडती है पीछेको । समाधि उतरती आगेको । अभ्यास पहुंचे पूर्णताको । आसन पर ॥ ९१ ॥ मुद्राका महत्व है ऐसे । कहता हूँ उसीको कैसे । भिडाके रान औ' जांघसे । पलथी मारना ॥ ९२ ॥ करके मन एकाग्र रोक चित्तेंद्रिय क्रिया । करे आसन पे बैठ योजना आत्म-शुद्धिकी ॥ १२ ॥ (22) १६९ आत्म-संयमयोग