ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 317, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंअजी ! जब यह घंट फूटता । घटाकाश है राहमें लगता । वह महदाकाशमें मिलता । या रहता वहीं ॥ ५३ ॥ यहां है ऐसा प्रकार । मिटता मात्र आकार । गगन है एकाकार । सदा सर्वत्र ॥ ५४ ॥ होता है जब यह बोध । न रहता मार्गका द्वैध । बनने पर सोऽहं सिद्ध । योगियोंको ॥ ५५ ॥ इसका कारण पांडुसुत । तुम्हे बनना योग-युक्त । जिससे सर्वदा समता । रहगी अपनेमें ॥ ५६ ॥ तबहो कुछ भी कभी । देह बंध हो न हो तभी । अखंड ब्रह्म बोध कभी । न बिगडेगा ॥ ५७॥ सभी प्रकारके मोहसे मुक्त मनुष्य— वह कल्पारंभमें न जनमता । कल्पांतमें भी वह नहीं मरता । स्वर्ग संसारादिमें नहीं फंसता । सृष्टि-कालमें ॥ ५८ ॥ जिस बोधसे वह योगी बनता । उसकी सरलता अनुभवता । अन्य भोगोंको तौलकर तजता । स्वरूपावस्थामें ॥ ५९ ॥ अर्जुन इंद्रादि देव । मानते अपना सर्वस्व । वह राज्य-भोग वैभव । मानता तुच्छ ॥ २६० ॥ वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् । अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥ २८ ॥ जो वेदका यज्ञ तथा तपोंका दानादिका पुण्य कहा गया है । जो लांघता सर्व हि जानके तो योगी चढे आद्य महान धाम ॥ २८ ॥ २४५ शांतत्ययोग