भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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राज-विद्या = समर्पणयोग ९ पित्र-रूपमें गुरु-वंदन— अजी ! ध्यानसे चित दीजिये । सब सुखका पात्र बनिये । प्रतिज्ञोत्तर यह सुनिये । प्रकट बात ॥ १ ॥ प्रौढ़तासे यह नहीं बोलता । आप सर्वज्ञोंसे स-ममता । ध्यान दें यह विनय करता । सर्वज्ञ-समाजसे ॥ २ ॥ लाड़लेके सब लाड़ पूर्ण होते । सब ही मनोरथ संपन्न होते । मातापिता जब हैं श्रीमंत होते । आपके समान ॥ ३ ॥ आपकी कृपा-दृष्टिके रससे । प्रसन्नताका बाग खिलनेसे । उसकी छायामें सोता, सुखसे । शांत जो मैं ॥ ४ ॥ प्रभु आप हैं सुखामृतके सागर । हम पाते शीतलता इच्छानुसार । यहां पर भी स्नेहार्थ सकुचाकर । कहां पायें शांति ॥ ५ ॥ यों तो बालक तुतलाता । टेढ़ा मेढ़ा पग रखता । उससे स-कौतुक माता । रीझती सदा ॥ ६ ॥ वैसा आप सन्तोंका प्रेम । चाहते जिसे सदा हम । इसीलिये करते प्रेम । श्री चरणोंमें ॥ ७ ॥ बोलनेमें क्या है मेरी योग्यता । जहां सर्वज्ञ भावा-दृश श्रोता । सरस्वती सुत है क्या सीखता । देकर पाठ ॥ ८ ॥ कितना ही बड़ा क्यों न हो ज्योतिरिंगण । नहीं प्रकाशता भानुबिंबके समान । नहीं मिलता अमृत थाळ सम पकवान्न । उसका उपाय क्या ? ॥ ९ ॥ (32)