ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 321, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिंतु कहता हूँ कर साहस । मनमें धरके मै एक आस । आपके सम्मुख कर साहस । प्रिय बनूं आपके ॥ २३ ॥ अजी ! शीतल जो चंद्रमासे । जीवनदायी है अमृतसे । पूर्ण करता अवधानसे । मेरी चाह ॥ २४ ॥ अजी ! कृपा-दृष्टिकी वृष्टि आपकी । करती है सृष्टि सकलार्थ मतिकी । सूखेगी कली अंकुरीत मतिकी । आपकी उदासीसे ॥ २५ ॥ देते हैं आप सहज अवधान । मिलता उससे वक्तृत्वको अन्न । जिससे होते हैं अक्षर संपन्न । सिद्धान्तोंसे ॥ २६ ॥ राह देखता तब अर्थ शब्दकी । सृष्टी होती नव-नव आशयकी । बहार आती है भाव सुमनोंकी । मति पर सतत ॥ २७ ॥ रहता है जहां संवादका उल्लास । बरसता स्वारस्वत हृदयाकाश । सूखता है वह सारस्वतका रस । जहां श्रोता हो दुश्चित्त ॥ २८ ॥ अजी ! चंद्रकान्त मणि द्रवता । वह द्रावकता चंद्र ही देता । वैसा वक्ता वक्ता नहीं हो सकता । बिन श्रोताके ॥ २९ ॥ हमें अब मधुर कर लेना । ऐसा क्या तंदुलोंको है कहना । या गुड़ियाको प्रार्थना करना । सूत्र धारसे कया ॥ ३० ॥ वह क्या गुड़ियाके लिये नचाता । या अपना कल-ज्ञान है बढ़ता । इसीलिए हमारा क्या आता जाता । इस झमेलेसे ॥ ३१ ॥ “अरे क्या हुआ पूछा तब श्रीगुरुने । कहा “तुम्हारा विनय सुना हमने ।” “कहो अब क्या कहा श्री नारायणने । धनंजयसे ॥ ३२ ॥ संतोषसे निवृत्तिका दास । “जी ! जी !!” कह कर स-उल्लास । बोले किया यह उपदेश । श्री कृष्णने तब ॥ ३३ ॥ भगवान उवाच इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे । ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥ १ ॥ श्री भगवानने कहा कहूंगा गुह्य जो श्रेष्ठ निष्पाप तुझसे अब । विज्ञान सह जो ज्ञान छुडाता दोषसे बडे ॥ १ ॥ २५१ राज-विद्या-समर्पणयोग