ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 353, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंन चलती जहाँ लक्ष्मीकी महत्ता । तथा शिवका तप नहीं पुरता । घामड़ लोगोंका भला क्या चलता । वहाँ धनंजय ॥ ८० ॥ इसीलिए तन अर्पित कर । सकल गुण कर न्योछावर । संपत्ति-मद श्री-चरण पर । रख तत्पश्चात् ॥ ८१ ॥ पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥ २६ ॥ मुझे निष्काम प्रेम चाहिये-प्रेमसे दिया पत्ता भी मैं सुखसे खाता हूं— कर निःसीम भाव उल्लास । मेरे अर्पणका ले उद्देश्य । जो भी फल दिया स-संतोष । लेता हूँ मैं ॥ ८२ ॥ जब वह भक्त मुझे दिखाता । अपने हाथ मैं दोनों बढ़ाता । उसका डंठल भी न तोड़ता । खाता हूँ आदरसे ॥ ८३ ॥ किसीने शुद्ध भक्तिसे । दिया सुमन प्रीतिसे । खाता भावातिरेकसे । भूल सूंघना ॥ ८४ ॥ फल-फूल क्यों इक पात । सूखा भी हो उसका गात । लेता उसे मोदसे पार्थ । देते हैं जो भक्तिसे ॥ ८५ ॥ देख भरा वह सर्व-भावसे । भूखा तोषता जैसे अमृतसे । वैसा मैं मुखमें तोषसे उसे । डालता हूँ पार्थ ॥ ८६ ॥ अथवा ऐसा भी जब होगा । वह पात भी नहीं मिलेगा । पानीका बूंद एक तो होगा । उसे नहीं अकाल ॥ ८७ ॥ वह है सर्वत्र रहता । सबको सहज मिलता । उसीका अर्पण करता । सर्वस्व मान ॥ ८८ ॥ उसने बैकुण्ठके विशाल । बनाया मेरे लिए महल । कौस्तुभसे भी अति निर्मल । दिये अलंकार ॥ ८९ ॥ प्रेमसे पत्र या पुष्प फल या जल दे मुझे भक्तिसे जो दिया सारा खाता मैं सुख-पूर्वक ॥ २६ ॥ २८३ - राज-विद्या-समर्पणयोग