भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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मेरी भक्ति में कुल जाति आदिका बंधन नहीं—मुझे प्रेम चाहिये— आती लेनेमें लज्जा नाम । जो अधमोंमें अधमतम । ऐसी योनिमें जिन्होंने जन्म । लिया है अर्जुन ॥ ४२ ॥ मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः । स्त्रियो वैश्यास्तथाशूद्रास्तेऽपि यांति परां गतिम् ॥ ३२ ॥ जो हैं पापयोनिके मूढ । जैसे पत्थर सम जड । किंतु है मुझमें वे दृढ । सर्व भावसे ॥ ४३ ॥ वाणीमें जिनके मेरे आलाप । नयन भोगते मेरे ही रूप । मनमें सतत मेरा संकल्प । भरे रहते हैं ॥ ४४ ॥ मेरी कीर्ति-कथाके बिन । न करते अन्य श्रवण । जिनके सर्वांग-भूषण । मेरी सेवा ॥ ४५ ॥ ज्ञानका विषय वे न जानते । केवल मुझ एकको जानते । उन्हें ऐसा लाभ मिला तो जीते । नहीं तो मरण ॥ ४६ ॥ ऐसा हुआ जो सम्पूर्ण । सर्व-भाव कर अर्पण । जीवनका बना जीवन । मैं ही एक ॥ ४७ ॥ पाप योनिमें हुआ जनन । सुनके भी न हुआ पठन । तुलनामें उनका वज़न । मुझसे कम नहीं ॥ ४८ ॥ भक्ति संपन्नताके कारण । देव बने राक्षसोंसे हीन । मेरा नरसिंहका भूषण । उसकी महिमा ॥ ४९ ॥ किया प्रह्लादका अंगीकार । मेरे स्थानमें पांडुकुमार । प्रह्लाद कथामें साक्षात्कार । होता मेरा ही ॥ ४५० ॥ उसका है दैत्य-कुल आखर । इंद्रको नहीं वह अधिकार । यहां है भक्ति महिमा अपार । कुल-जातिकी नहीं ॥ ५१ ॥

करके आसरा मेरा भोले स्त्री-वैश्य-शूद्र भी । या पाप-योनिके जीव पाते हैं सुख शाश्वत ॥ ३२ ॥ (37) २८९ राज-विद्या-समर्पणयोग