भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वृजांगनाएं प्रेमवश होकर । मनमें स्मरण कर निरन्तर । पार्थ वे सब मुझसे मिलकर । मद्रूप हो गयीं ॥ ३४ ॥ वैसे ही भयके करण । निशिदिन कर चिंतन । अखंड बैर धर मन । कंस चेद्यादि ॥ ६५ ॥ ममत्वसे भी भक्त मुझे मिलते हैं— आप्तत्वसे हैं पांडव । संगसे सब यादव । ममत्वसे वसुदेव । तथा अन्य भी सब ॥ ६६ ॥ नारद ध्रुव अक्रूर । शुक और सनत्कुमार । भक्तिसे मैं धनुर्धर । हुवा प्राप्त ॥ ६७ ॥ वृजांगनाओंको कामसे । कंसको भय संभ्रमसे । धातुक मनके धर्मसे । शिशुपालादिकको ॥ ६८ ॥ सब पंथोंका एक स्थान । होना है मुझमें विलीन । सभक्ति विषय भंजन । या विराग वैसे ॥ ६९ ॥ इसलिए हे अर्जुन । होने मुझमें विलीन । उपायोंका जो बंधन । नहीं है कोई ॥ ४७० ॥ तथा किसी कुलमें होना जनन । करें प्रेम-वैर अथवा भजन । किंतु भक्त या शत्रु होना अर्जुन । एकमात्र मेरा ही ॥ ७१ ॥ किसी रूपमें सतत । होना है मुझमें रत । मद्रूप होना निश्चित । स्वाभाविक ॥ ७२ ॥ वैसे ही पाप योनी भी अर्जुन । क्षत्रिय वैश्य शूद्र औ' अंगना । भजकर मुझे मेरे सदन । पायेंगे ही ॥ ७३ ॥ वर्णमें हैं जो छत्र चामर । स्वर्ग है जिनका अग्रहार । मंत्र है जिनका मातृघर । वे हैं ब्राह्मण ॥ ७४ ॥ बसता जहाँ अखंड याग । तथा हैं जो वेदोंका वस्त्रांग । जिनकी दृष्टिका है उत्संग । बढाता मांगल्य ॥ ७५ ॥ जो हैं पृथ्वी तलके देव । तपावतार जो सवयव । सकल तीर्थोंका जो है दैव । उदित हुआ है ॥ ७६ ॥ २९१ राज-विद्या-समर्पणयोग