ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरथ्योदक हो जहां गंगा-शरण । करते हैं सागरोदक वरण । वहां जान्हवीकी समरस पूर्ण । अन्य गति कैसी ॥ ८७ ॥ इसलिए राजऋषि हो या ब्राह्मण । उनकी गति मति मैं ही हूँ शरण । उनका त्रिशुद्धि पूर्वक है निर्वाण । स्थिति-गति मैं हूँ ॥ ८८ ॥ जीर्ण आयुष्य नौकामें बैठकर मूर्खता-- बैठकरके शत-जर्जर नावमें । होता कैसे कहो निश्चित मनमें । या विवश हो जीना कैसे रणमें । शत संवत्सर ॥ ८९ ॥ पडता जहाँ पाषाण शरीर पर । न रखें ढाल कहो बीचमें क्योंकर । रहे कैसे उदास हो रोग-जर्जर । शरीर औषधसे ॥ ४९० ॥ भड़की जहां चहूं ओर आग । न जाय कैसे बचाकर भाग । कष्टमें नित न हो सानुराग । मुझे न भजे कैसे ॥ ९१ ॥ नहीं लगे मेरे भजनमें । ऐसा क्या सामर्थ्य है जनमें । विश्वास घरमें या भोगमें । है उनके ॥ ९२ ॥ या विद्याका या आयुका । ऐसा कौनसा प्राणियोंका । है मुझे न भजनेका । कहो सुखाधार ॥ ९३ ॥ मिलता है जितना भोग्य-जात । वह है केवल शरीर हित । ओ' शरीर रहता है सतत । मृत्युके मुखमें ॥ ९४ ॥ अजी ! दुःखका माल आयात होता । हाठमें मृत्युके तौलसे तुलता । उस मृत्युलोकमें आना पडता । अन्तिम हाठमें ॥ ९५ ॥ अब सुखका जीवित । कैसे मिले पांडुसुत । फूंककर राख जोत । जलेगी कैसे ॥ ९६ ॥ अजी ! विषकंद पीसकर । उसका रस निचोडकर । उसे नाम अमृत देकर । अमर हो कैसे ॥ ९७ ॥ ऐसे हैं विषयोंका सुख । केवल है परम दुःख । सेवन करते हैं मूर्ख । जीव भावसे ॥ ९८ ॥ २९३ राज-विद्या-समर्पणयोग