ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्दारण्यमें भटक दिन-रात । न सुनी अक्षर फलनेकी बात । वाचा-बनी स्वयं कल्पलता सत्- । विवेककी यहां ॥ २० ॥ देहात्म-बुद्धि भी जो निरंतर । बनी थी मंदिर आनंदका भंडार । मनने किया गीतार्थका सागर । शयन सुखसे ॥ २१ ॥ श्री गुरुकी लीला अपार । करूं कैसे वर्णन मै पामर । फिर भी गाया ढीठ बनकर । सहन कीजिये यह ॥ २२ ॥ आपका ही कृपा-प्रसाद । बना भगवद्गीता प्रबंध । पूर्वार्ध गाया स-विनोद । ओवियोंमें ॥ २३ ॥ सूत्र रूपसे पिछले नौ अध्यायोंका उपसंहार -- पहलेमें अर्जुनका विषाद । दूसरेमें गाया योग विशुद्ध । किंतु सांख्य तथा ज्ञानका भेद । दिखा कर ॥ २४ ॥ तीसरेमें केवल कर्म प्रतिष्ठित । चौथेमें वही ज्ञान-सह प्रकटित । पांचवेमें अष्टांग-योगका गुपित । कहा वैसे ही ॥ २५ ॥ छठेमें कहा वही प्रकट । आसनादि-सह कर स्पष्ट । जीवात्म-भावैक्य जो है श्रेष्ठ । होता जिससे ॥ २६ ॥ वैसी ही वह योग-स्थिति । योग-भ्रष्टोंकी है क्या गति । वह पूर्णस-उपपत्ति । सुना दी है ॥ २७ ॥ उस पर है जो सप्तम । प्रकृति-रूप उपक्रम । भक्त चार पुरुषोत्तम । होते हैं कैसे ॥ २८ ॥ फिर सप्तमीकी प्रश्न सिद्धि । कह करके प्रयाण-सिद्धि । एवं सकल वाक्य अवधि । अष्टमाध्यायमें ॥ २९ ॥ अगणित है जो शब्द-ब्रह्म । उसमें है जो अर्थ परम । महा-भारतमें अनुपम । एक लक्ष्यमें मिलता ॥ ३० ॥ फिर अठारह पर्व भारतमें । मिलता वह कृष्णार्जुन उक्तिमें । तथा अभिप्राय जो सप्तशतिमें । नौवेमें मिलता ॥ ३१ ॥ तभी नवमका अभिप्राय । पूर्ण हुआ करनेमें भय । प्रतीत कर नवमाध्याय । हुआ किस गर्वसे ॥ ३२ ॥ ज्ञानेश्वरी ३००