ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजी ! नारदादिक जो संत । उनकी उक्ति रूप सरिता । मैं महोदधि बना अनंत । संवाद सुखका ॥ ६५ ॥ मेरा अनेकानेक जन्म- । किया हुआ जो सत्कर्म । फला है यह अत्युत्तम । तू सद्गुरु रूप ॥ ६६ ॥ वैसे सुने थे वृद्धोंके वचन । सदैव तेरे ही गुण-वर्णन । हुई अब तेरी कृपा महान । तभी फले सब ॥ ६७ ॥ तभी भाग्य होता अनुकूल । उद्यम होते सब सफल । सुना था वह है जो सफल । हुआ गुरु कृपासे ॥ ६८ ॥ माली जिसमें जन्म बिताता । गाछ लगाकर जन्म देता । किंतु वसंतमें ही खिलता । अनायास ॥ ६९ ॥ जब विषम ज्वर उतरता । तभी रसनामें स्वाद आता । रसायन भी है जो फल देता । जब होता आरोग्य ॥ १७० ॥ वाचा श्रवण नयन प्राण । अनुभवते सार्थकपन । संचरता उसमें चेतन । तभी मात्र ॥ ७१ ॥ वैसे शब्दजातका अध्ययन । योगाभ्यासादि समस्त साधन । अपना कह सकते हैं जान । जब गुरु अनुकूल ॥ ७२ ॥ इस प्रतीतिके आनंदसे । नाचता अर्जुन निश्चयसे । कहता है हे देव ! कृष्णसे । तेरी बात मानी ॥ ७३ ॥ सच है यह कैवल्यपति । हुई मुझे त्रिशुद्ध प्रतीति । सुरासुर-नरादिकी मति । न जानती तुझे ॥ ७४ ॥ न सुनकर तेरा वचन । अपनेसे ही कर चिंतन । अशक्य है होना तेरा ज्ञान । हुआ मेरा निश्चय ॥ ७५ ॥ स्वयमेवात्मनाऽऽत्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥ १५ ॥ तू ही है अपने आप जानता पुरुषोत्तम । देव देव जगन्नाथ भूतेश-भूत भावन ॥ १५ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१४