ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविभूति जो यहां समस्त । लोगोंमें व्याप्त है अनंत । जो है प्रधान औ' विख्यात । कर तू प्रकट ॥ ८६ ॥ कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् । केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥ १७ ॥ किस भांति जानूं तुझको । किस भांति गाऊं तुझको । विश्व रूप कहूँ तुझको । न होगा चिंतन ॥ ८७ ॥ अजी ! पीछे कहे जैसे । निज-भाव कहे वैसे । अभी सबिस्तर तैसे । कह तू एक बार ॥ ८८ ॥ किन भावोंका ले आधार । भजनेसे है सुखकर । कह वह मुझे सत्वर । विभूति-योग ॥ ८९ ॥ विस्तरेणाऽत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वंतो नास्ति मेऽमृतम् ॥ १८ ॥ अर्जुनकी विभूति-विस्तार सुननेकी इच्छा— मैंने पूछा जो विभूति । वहि कहो भूतपति । पुनः इसकी पुनरुक्ति । करना क्या ॥ १९० ॥ ऐसी आवे तो भाव कल्पना । उसको जाने दो जनार्दन । मुझ जैसेको अमृत पान । ना न कहलाता ॥ ९१ ॥ कालकूटका जो सहोदर । मृत्यु भयसे पिये अपार । किंतु चतुर्वेश पुरंदर । होते जाते हैं ॥ ९२ ॥ ऐसा वह क्षीराब्धिका रस । उसमें है अमृतका बास । उसके जो माधुर्य मृष्टांश । नहीं छोडा जाता ॥ ९३ ॥ उस अल्पामृतकी यह महता । उस सामान्यकी वह मधुरता । यहां तेरा वचन परमामृत । कहना क्या ॥ ९४ ॥ योगेश जानूं मैं कैसे तुझे चिंतनमें नित । कौन कौन स्वरूपोंमें करूं मैं तब चिंतन ॥ १७ योग-विभूति-विस्तार कह तू अपना निज । सुनके न अघाता मैं वचनामृत पानसे ॥ १८ ॥ ज्ञानेश्वरी ३१६