भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वैसे थी प्रकृतिकी अडचन । हटाया तूने उसे जनार्दन । पर-तत्वमें की है फिर लीन । बुद्धि मेरी ॥ ७६ ॥ इस विषयमें मेरा देव । हुवा संदेह रहित जीव । किंतु और एक संकल्प-भाव । हुआ उत्पन्न ॥ ७७ ॥ रहने दिया इसे संकोचकर । किससे पूछें कहो चक्रधर । तेरे बिना नहीं अन्य आधार । जानता मैं ॥ ७८ ॥ जलचर माने जलका आभार । या बालक स्तन्यका संकोच कर । जीनेका वह दूसरा क्या आधार । ढूंढेगा देव ! ॥ ७९ ॥ तो संकोच नहीं करना । मनकी जो बात कहना । कहे तब कृष्ण अर्जुन । कह तू चाह ॥ ८० ॥ एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥ स-संकोच विश्व-रूप दर्शनकी प्रार्थना - तब कहता किरीटी । कही थी तूने जो गोष्टि । उससे प्रतीति दृष्टि । शांत हुई मेरी ॥ ८१ ॥ संकल्प जहांसे है निकलता । लोक-क्रमका उदयास्त होता । जिस स्थानको है तू 'मैं कहता । जनार्दन ॥ ८२ ॥ वह वास्तविक रूप है तेरा । जहांसे आता तू ले अवतार । सुर-कार्यार्थ तू है चक्रधर । द्विभुज या चतुर्भुज हो ॥ ८३ ॥ क्षीर-शयनाभिनय समाप्त कर । मत्स्य-कूर्मका अलंकार छोड़कर । लीला-साधन सबको तू छिपाकर । रखता लपेटके ॥ ८४ ॥ उपनिषद करते गायन । योगी-जन हृदयमें दरशन । सनकादिक नित आलिंगन । करते जिसके ॥ ८५ ॥ , तेरा जो ईश्वरी रूप मानना हूँ यथार्थ है । वही मैं देखना चाहूँ प्रत्यक्ष पुरुषोत्तम ॥ ३ ॥ ३३९ विश्व-रूप-दर्शनयोग