भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वर्षाका जैसे प्रथम काल । सर्वांग हरा होता है शैल । वैसे रोम-कूपमें सकल । खिले रोमद्रुम ॥ ४७ ॥ स्पर्श होते ही चंद्रकिरण । होता सोम-कांतका द्रवण । तन पर वैसे स्वेद-कण । उमड़ आये ॥ ४८ ॥ फंस जानेसे जैसे अलिकुल । झूलती कमल कलि सकल । हृदय-आनंदोर्मियोंके बल । सिहरता वैसे ॥ ४९ ॥ कर्पूर-केलिका गर्भ-पुट जैसे । छीलकर कर्पूर चूता वैसे । अर्जुनके नयन-कमलोंसे । चूते अश्रुकण ॥ २५० ॥ सात्त्विकताके ये जब अष्ट भाव । परस्परमें करते हैं उछाह । पाता है तब ब्रह्मानंदका जीव । दिव्य-साम्राज्य ॥ ५१ ॥ उदित होते ही सुधाकर । सानंद उमड़ता सागर । बार बार वैसे ऊर्मि भर । आती हृदयमें ॥ ५२ ॥ अजी ! सुखानुभवके कारण । कृपासे किया था द्वैत रक्षण । आह भर करके प्रतिक्षण । देखता पार्थ ॥ ५३ ॥ मुख कर बैठा था जिस ओर । उसी ओर मस्तक नवाकर । प्रणाम किया हाथ जोड कर । औ' किया स्तवन ॥ ५४ ॥ अर्जुन उवाच पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् । ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५ ॥ अर्जुनने कहा हे देव देखूं तव देहमें मैं हैं देव औ' भूत समूह सारा । ध्यानस्थ ब्रह्मा कमलासनस्थ महर्षि औ' नाग हैं एक साथ ॥ १५ ॥ ३५५ विश्व-रूप-दर्शनयोग