ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकभी किसीने जो देखा नहीं था। सो देख तू भय-भीत हुवा था। संचित प्रेम-सर्वस्व जो भी था। रख वह यहीं पर ॥ ३८ ॥ अब तू जैसा ही है कहता। वैसे शांत रूप मैं धरता। विश्वतोमुख यह कहता। तू निहार अब ॥ ३९ ॥ सञ्जय उवाच इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥ ५० ॥ विश्वरूप विसर्जन -- ऐसा वाक्य कह वह तत्क्षण । मनुष्य हुवा देव विलक्षण । कहें क्या प्रेमका वह लक्षण । लीला-कौतुक ॥ ६४० ॥ श्रीकृष्ण है कैवल्यधाम प्रकट । देता है सर्वस्व विश्व-रूप श्रेष्ठ । किंतु न भाता अर्जुनको जो शिष्ट । वह रूप अद्भुत ॥ ४१ ॥ जैसे कोई वस्तु लेकर लौटाना । रत्नोंका खोट निकालते बैठना । अथवा कन्या देखकर कहना । यह मन-भाया नहीं ॥ ४२ ॥ दिखा दी उसको विश्व रूपकी जो दशा । इससे दीखता प्रेम विकास है कैसा । देवने दिया रहस्यमय उपदेश । धनंजयको ॥ ४३ ॥ सुवर्णका घड गलाकर । किया जो आभूषण सुन्दर । नहीं हुवा उसका स्वीकार । गलाया पुनः ॥ ४४ ॥ संजयने कहा ऐसा कहा श्रीहरिने तुरंत तथा दिखाया वह पूर्व-रूप । आश्वस्त करने डरे हुएको हुवा पुनः सौम्य उदार देव ॥ ५० ॥ ज्ञानेश्वरी ३९८