भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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आया जैसे कालको जीतकर । अथवा बवंडर चीरकर । या सप्त-सागर तैरकर । अपने बाहूसे ॥ ५८ ॥ उसे हुआ ऐसा अति-संतोष । माना पार्थने परम-उल्लास । देख कर श्रीकृष्णको स-हास । विश्व-रूपके नंतर ॥ ५९ ॥ सूर्यके होते ही अस्तमान । नक्षत्रोंसे भरता गगन । वैसे देखने लगा अर्जुन । लोगों सह पृथ्वी ॥ ६६० ॥ देखता वैसे ही कुरु-क्षेत्र । दोनों ओर हैं वैसे सगोत्र । रण-सज्ज वीर ले शस्त्रास्त्र । चलाते हुए ॥ ६१ ॥ रण-मध्यमें वहां सब शांत । वैसा ही रथ खडा है रक्षित । बैठा है उसमें श्रीलक्ष्मी-कांत । अपने पास ॥ ६२ ॥ अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१ ॥ एवं पहले जैसे था वैसे । देखा यह वीर्य-विलाससे । फिर कहता जिया मैं ऐसे । हुवा अब ॥ ६३ ॥ बुद्धिको छोड कर ज्ञान । भयसे गया था जो वन । अहंकार सह है मन । भाग गया था ॥ ६४ ॥ इन्द्रियां प्रवृत्ति भूल गयी थीं । भाषा प्राणसे वंचित हुई थीं । शरीर-ग्राममें अव्यवस्था थी । अभूतपूर्व ॥ ६५ ॥ हुवे वे सब अब प्रफुल्लित । प्रकृति हुई फिरसे जीवित । अब हुवा पुनरुज्जीवित । ऐसे लगता मुझे ॥ ६६ ॥ जीवने ऐसा सुख पा लिया । फिर कृष्णसे है कह दिया । मैंने तेरा वह जो पा लिया । यह मानवी रूप ॥ ६७ ॥ अर्जुनने कहा देखके यह जो सौम्य मानवी-रूप माधव । हुवा प्रसन्न औ' शांत आया मैं निज भावमें ॥ ५१ ॥ ज्ञानेश्वरी ४००