ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंया हलका अंग जैसे मेघका । उडायेगा मानो झोंका वायुका । किंतु बरसते आश्चर्यका । घनघोर मेह ॥ १३ ॥ होता वह पूर्णत्वमें जैसे । देख तृष्णा भी पूर्ण हो वैसे । किंतु रहता है कंगालीसे । परिपूर्ण ॥ १४ ॥ ऐसे जो चिन्ह-युत । दीखता है सतत । ज्ञान है करगत । नित्य उसके ॥ १५ ॥ है जो अदंभ पन । इसीका नाम जान । अब तू मर्म सुन । अहिंसाका ॥ १६ ॥ ३ अहिंसा-विवेचन, याज्ञिक-अहिंसा- अहिंसाके अनेक प्रकार । कहते हैं नाना मतांतर । करते हैं अपना प्रचार । निरूपणसे ॥ १७ ॥ वह सब ऐसा देख । जैसा तोड़ कर शाख । किया है जडमें देख । उससे बाढ ॥ १८ ॥ या हाथोंको तोड-बेचकर । करना क्षुधाका परिहार । या मंदिरको तुड़वा कर । बांधलें पौली ॥ १९ ॥ वैसे हिंसा कर अहिंसा । उत्पन्न करना है ऐसा । निर्णय है पूर्ण-मीमांसा- । का धनंजय ॥ २२० ॥ अवृष्टिके उपद्रवसे जब । विश्व होता है जर्जरित तब । करना याग नाना विध सब । पर्जन्यार्थ ॥ २१ ॥ जब होता यज्ञका मूल । पशु-हिंसासे ही सरल । कहो तब अहिंसा-कूळ । देखें कैसे ? ॥ २२ ॥ बोनेसे केवल हिंसा । फलेगी कैसी अहिंसा । अचरजका साहस । याज्ञिकोंका ॥ २३ ॥ आयुर्वेद और अहिंसा- तथा आयुर्वेद संपूर्ण । इसी ढंगका है अर्जुन । करना जीवके कारण । जीव घात ॥ २४ ॥ ज्ञानेश्वरी ४४८