ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं तो सुन पार्थ । गुरु-शिष्य सत्पथ । टूट जाता सर्वथा । शब्द ही रुकेगा ॥ ८८ ॥ इसी कारणसे श्रुति । द्वैत भावसे करती । स्पष्ट अद्वैतकी स्थिति । परंपरासे ॥ ८९ ॥ सुन तू वही अब धनुर्धर । यहां जो नेत्र-गोचर आकार । वह सब ज्ञेय इस प्रकार । विश्व-व्यापक है ॥ ८९० ॥ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १४ ॥ ब्रह्मदर्शनकी कृतार्थता— अर्जुन वह व्याप्त है ऐसे । अवकाशको आकाश जैसे । वस्त्र रूपसे हैं तंतु जैसे । होते हैं व्याप्त ॥ ९१ ॥ उदकमें जैसे रसत्व । दीपमें जैसे प्रकाशत्व । वैसे व्याप्त है वह तत्व । सदा सर्वत्र ॥ ९२ ॥ कर्पूरत्वसे कर्पूरमें जैसे सौरभ । सौरभ भरा रहता है वैसे । कर्म-रूपसे शरीरमें वैसे । बसता शरीर ॥ ९३ ॥ अथवा जैसे है अर्जुन । स्वर्णमें व्यापता है सुवर्ण । वैसे ही सर्वांग-संपूर्ण । बसता है वह ॥ ९४ ॥ कण रूपमें रहता सुवर्ण । कहते तब सुवर्णका कण । टूटता है कण-रूप सुवर्ण । स्वर्ण कहते तब ॥ ९५ ॥ प्रवाह जब टेढा बनता । पानी है तब सीधा रहता । आगसे लोहा लाल हो जाता । न होता वह अग्नि ॥ ९६ गोल होता जब घटाकार । नभ होता तब गोलाकार । होता है जब घर चौकाकार । नभ भी वैसे ही ॥ ९७ ॥ ———————————————————————————————— वह जो इंद्रियातीत उनके कार्य भासते । अ-स्पर्शसे धरे सारे अगुण गुण भोगके ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ५०४