ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसीलिये गुणका संग । अथवा होना गुण-भोग । वह है निर्गुणमें त्याग । नहीं होता ॥ ११ ॥ बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च । सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥ १५ ॥ चराचर भूतोंमें होता । विविध अग्नि पांडुसुत । किंतु होती जैसी उष्णता । अभेद रूपसे ॥ १२ ॥ वैसे ही अविनाश भावसे । रहता पूर्ण सूक्ष्म रूपसे । व्याप्त होकर जान उसे । यहां तू ज्ञेय ॥ १३ ॥ एक जो बाहर अंदर । वही एक पास औ' दूर । उस एकसे धनुर्धर । नहीं अन्य ॥ १४ ॥ अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् । भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥ १६ ॥ क्षीर-सागरमें जैसा । माधुर्य होता एक-सा । तटमें मध्यमें वैसा । पूर्ण है जो ॥ १५ ॥ स्वेदज अंडजादिक । भूतोंमें व्याप्त जो एक । न होता उसमें देख । कभी न्यून ॥ १६ ॥ जिस प्रकार अनेक घटोंमें । प्रतिबिंब पडते सहस्रोंमें । किंतु भिन्नता नहीं चंद्रिकामें । वैसे ही पार्थ ॥ १७ ॥ या नाना लवण-कण राशिमें । क्षारता एक-सी होती सबमें । अथवा अनेक इक्षु-दंडमें । मिठास एक-सी ॥ १८ ॥ एक है जो अंतर्बाह्य जो है एक चराचर । जो है दूर तथा पास सूक्ष्मत्वसे अगम्य जो ॥ १५ ॥ अभेद भूत-मात्रोंमें रहा है जो विभक्त-सा । जन्म दे पालता भूत लीलता अंतमें स्वयं ॥ १६ ॥ ज्ञानेश्वरी ५०६