ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहा-प्रलय शैय्यापर सोता । जब यह खेल करके आता । कल्पोदयमें यह है उठता । विषम-ज्ञानसे ॥ १२ ॥ इस प्रकार अर्जुन । मिथ्या दृष्टिका सदन । युगानुवृत्ति चरण । रखता स-कौतुक ॥ १३ ॥ संकल्प है इसका इष्ट । अहंकार साथी विनट । इसका अंत है निकट । आता ज्ञानसे ॥ १४ ॥ रहने दो बखान बहुत । यह विश्व है मायासे जात । मेरी सत्ता है आधारभूत । इस कार्यमें ॥ १५ ॥ सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४ ॥ इस दृश्यमान विश्वमें भी मैं ओतप्रोत भरा हूं— इसीलिये मैं पिता । महद्ब्रह्म है माता । आपत्य पांडुसुता । जगडंबर ॥ १६ ॥ शरीर है सो अब बहुत । देखके चित्तमें न हो द्वैत । मन बुद्धि आदि जो हैं भूत । एक ही यहां ॥ १७ ॥ जैसे शरीरमें एक । अवयव होते अनेक । कैसे विचित्र विश्व देख । एक ही यहां ॥ १८ ॥ ऊंची नीची विविध प्रकार । होती डालियां विविध आकार । होता है उसका जो आधार । बीज एक ॥ १९ ॥ संबंध है वह भी कैसा । घट माटीका पुत्र जैसा । या कपासका पुत्र जैसा । वस्त्रत्व होता है ॥ १२० ॥ अनेक लहरोंकी परंपरा । सिंधु-संतति जिस प्रकार । सब चराचरका औ' हमारा । संबंध भी ऐसा ॥ २१ ॥ किसी भी योनिमें मूर्ति जन्मती है कहीं कभी । उन्हें प्रकृति है माता पिता मैं बीज रोपता ॥ ४ ॥ ५४१ गुण-निस्तारयोग