ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबंध क्यों नहीं बांधता । मुझे मैं सही जानता । अज्ञान कारण होता । बंधका वहां ॥ ३५ ॥ मुझको ये बंधन ऐसे । किन गुणसे दीखे वैसे । कहता हूं शांत चित्तसे । सुन तू इसको ॥ ३६ ॥ सत्व रज तम इन तीन गुणोंके कारण पुनर्जन्म होता है— कितने गुण है या धर्म । उसका क्या रूप औ' नाम । कहां हुए इसका मर्म । कहता हूं सुन ॥ ३७ ॥ सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५ ॥ सुन सत्व रज तम । यहां तीनोंके ये नाम । तथा प्रकृतिसे जन्म । पाते हैं ये ॥ ३८ ॥ यहां है सत्व उत्तम । तथा रज है मध्यम । तीनोंमें है यह तम । कनिष्ट सहज ॥ ३९ ॥ जैसे एक ही शरीरमें तीन । अवस्थायें होती हैं भासमान । एक अंतःकरणमें त्रिगुण । होते हैं भास ॥ १४० ॥ जैसे जैसे कस-हीन । होता सोनेमें मिलन । बढ़ स्वर्णका वजन । होता अवमूल्य ॥ ४१ ॥ सावधानता जैसे जैसे । दूर होती है आलससे । जकड़ती है निद्रा वैसे । दृढ मूल हो ॥ ४२ ॥ अज्ञान अंगीकार कर । उठती है वृत्ति ऊपर । वह है सत्व रज द्वारा । तममें भी जाती ॥ ४३ ॥ यह तू जान अर्जुन । इनका नाम है गुण । अब करना दर्शन । बद्धताका ॥ ४४ ॥ प्रकृतिसे बने हैं ये गुण सत्व रजस्तम । वे निर्विकार आत्माको जोतते मान देहमें ॥ ५ ॥ ५४३ गुण-निस्तारयोग