ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ दैवासुर-संपद्विभाग-योग चित्सूर्य श्रीगुरु वंदन- मिटाते हुये विश्वका आभास । उदित हुआ विस्मित चंडांश । अद्वय-कमलिनीका विकास । नमन करें अब ॥ १ ॥ अविद्या-तम जो दूर करता । ज्ञानाज्ञान तारोंको निगलता । ज्ञानियोंका है सुदिन करता । स्वबोधका ॥ २ ॥ जिससे उदित होते ही दिन । खुलके आत्म-ज्ञानके नयन । तजता है जीव-पक्षी अर्जुन । देहभावका घोंसला ॥ ३ ॥ लिंग-देह कमल मध्यमें । फंसा चिद्भ्रमर बद्धतामें । बंध-मोक्ष होता है प्रकाशमें । उसके उदयसे ॥ ४ ॥ सिकुडे पथमें शष्प-शब्दोंके । दोनों किनारोंमें भेद-नदीके । चीखते हैं पागल विरहके । बुद्धि औ' बोध ॥ ५ ॥ उन चक्रवाकोंका मिथुन । समरसका जो समाधान । प्रतीत करता चिद्गगन । भुवनका दीप ॥ ६ ॥ जिसके उदयका प्रातःकाल । मिटाता है भेद-चोरका काल । आत्मानुभव-पथिक सकल । चलते योगी ॥ ७ ॥ जिसके विवेक-किरण संग । उन्मेष-सूर्यकांतके स्फुलिंग । जला देता है अरण्य-विभाग । संसारके ॥ ८ ॥ रश्मि-पुंज जिसका अति प्रखर । होते ही स्वरूप ऊसरमें स्थिर । आता वहां महा सिद्धियोंका पूर । मृगजलका ॥ ९ ॥ (79)