भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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किंतु रंकने देखा अमृत सागर । तब जो उचितानुचित भूलकर । दौडा करने उसका पाहुनाचार । लेकर साग-पात ॥ २२ ॥ यहां साग-पात ही बहुत कहना । उसके हर्ष-वेगपर ध्यान देना । दीपसे सूर्यकी आरती उतारना । यहां देखना भक्ति ॥ २३ ॥ बालक यदि उचित जानता । उसका बालपन क्या रहता । किंतु होती है जो उसकी माता । तोषती बहू ॥ २४ ॥ गांवकी गंदगीसे भरा जो नीर । आता है सिर पर पैर देकर । तब कहती क्या गंगा हठो दूर । उससे कभी ॥ २५ ॥ अजी ! कैसा था भृगुका अपाचार । उसको मानकर प्रियोपचार । तब की हरिने संतुष्ट होकर । गुरुकी पाद्य-पूजा ॥ २६ ॥ आता जब गगन तमसे भर । सूर्यके सम्मुख तब देखकर । कहता है क्या भास्कर “तू हो दूर ।” कभी ऐसे ॥ २७ ॥ वैसे भेद-बुद्धिकी तुला पर । सूर्योपमाके शब्द डालकर । तोला है जो मैंने श्रीगुरुवर । सहन करें स्वामी ॥ २८ ॥ देखा जिन्होंने ध्यान-चक्षुसे । वर्णन किया है वेद-काव्यसे । वह सब क्षमा किया जैसे । मुझे भी क्षमा कर ॥ २९ ॥ किंतु आज मैं तेरे गुणगानमें । ललचाया दोष न मान मनमें । न उठूंगा कभी मैं अर्थ-तृप्तिमें । कुछ भी हो फिर ॥ ३० ॥ जन्म-जन्मांतरके सत्य-वचन-तपका फल है यह गीतार्थ — गीताके नामसे तेरा सतत । सेवन करता प्रसादमृत । तभी वर्णन किया है ईप्सित । दैवसे मिला दूना ॥ ३१ ॥ किया सत्य-वचनका तप । मेरी वाणीने अनेक कल्प । उस फलका है महा-दीप । मिला यह स्वामी ॥ ३२ ॥ पुण्य-पोषण किया असाधारण । उससे ही हुवा तेरा गुण-वर्णन । यह फल देकर हुए उऋण । आज वे स्वामी ॥ ३३ ॥ ६२७ दैवासुर-संपद्विभाग-योग