भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इन छह दोषोंसे संपूर्ण । बनाया है आसुरी भवन । इसलिये अल्प न अर्जुन । आसुरी संपदा ॥ ५६ ॥ या क्रूर ग्रहोंका मिलन । होता एक राशिमें जान । या निंदकके पास पूर्ण । आते सब पाप ॥ ५७ ॥ या मरनेवालेके अंग । ग्रासते जैसे सभी रोग । या कुसमयमें दुर्योग । होते एकत्र ॥ ५८ ॥ या जीवन समाप्तिकी आती बेला । बकरीको डसता बिच्छू काला । वैसे ये छ ही दोष जिसे सकल । घेरते हैं ॥ ५९ ॥ विश्वासु जैसे चोरसे पकड़वाता । या थका हुवा महापूरमें फंसता । वैसे ही इन दोषोंसे अनिष्ट होता । मनुष्यका सदैव ॥ २६० ॥ यदि किसी मोक्ष-पथिक पर । इनका पडा इक छींटा भर । डुबाएगा उसे भव-सागर । न उठेगा वह ॥ ६१ ॥ उतरके अधम योनिकी । सीढी परसे जो अंतिमकी । स्थावर तक गति उसकी । पहुंचेगी ही ॥ ६२ ॥ छ दोष ये जिनमें । पाये जाते उनमें । बढ़ती संपदामें । आसुरी जो ॥ ६३ ॥ ऐसे हैं ये भिन्न । संपदा तू जान । कही स-लक्षण । तुझसे अब ॥ ६४ ॥ दैवी संपद्विमोक्षाय निबंधायासुरी मता । मा शुचः संपदं दैवीमभिजातोऽसि पांडव ॥ ५ ॥ तू दैवी संपत्तिका स्वामी है— इन दोनोंमें पहली । दैवी संपदा जो भली । मोक्ष-सूर्यसे उजली । प्रभात जान ॥ ६५ ॥ मुक्तता करती दैवी आसुरी बांधती जहां । पायी है संपदा तूने दैवी न कर सोच तू ॥ ५ ॥ ज्ञानेश्वरी ६४८