भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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जो हैं अर्जुनके साथ । बैठ सकते हैं सन्त । कृपया सुने ये बात। दत्त-चित्त हो ॥ ६२ ॥ श्रोताओंको नमन— आपका हृदय है अति कोमल । तभी निकले हैं ये प्रीतिके बोल । वैसे मेरी विनय अति सरल । चरण युगलमें ॥ ६३ ॥ जैसे स्वभाव माता-पिताका । तोतली बोली सुननेका । सानंद अपने आपत्यका । वैसे ही यहां ॥ ६४ ॥ वैसे किया मेरा स्वीकार । सज्जनोंने अपनाकर । कम अधिक क्षमाकर । उपेक्षासे ॥ ६५ ॥ कविकी नम्रता— किंतु दूसरे ही अपराधका । क्षमा प्रार्थी हूं मैं यहां आपका । गीतार्थ कथनके प्रयासका । सुनियेजी ॥ ६६ ॥ न सोचकर अपनी क्षमता । चित जो यह साहस करता । जैसे भानु-तेजमें चमकता । खद्योत जैसे ॥ ६७ ॥ अथवा जैसे टिटहर । सुखाना चाहता सागर । वैसे अल्पज्ञ यह भार । उठाता है ॥ ६८ ॥ यदि है आकाश लपेटना । उससे अधिक बडा होना । ऐसा है यह मेरा करना । विचारान्तमें ॥ ६९ ॥ ऐसी है गीतार्थकी महत्ता । शंभु स्वयं कथन करता । प्रश्न करती भवानी माता । चमत्कृत होके ॥ ७० ॥ शिव कहते हैं उमासे । अथाह तव रूप जैसे । भगवद्गीता तत्व वैसे । नित्य नूतन ॥ ७१ ॥ यह है वेदार्थ सागर । उस निद्रस्थका है घोर । कहता यह सर्वेश्वर । प्रत्यक्ष रूपसे ॥ ७२ ॥ ऐसा है जो अगाध । भ्रमते जहां वेद । वहां मैं मतिमंद । कहूंगा क्या ॥ ७३ ॥ ज्ञानेश्वरी ६