ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 745, कुल 1172 में से
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शास्त्ररहित श्रद्धापूर्वक पूजनेवालोंकी क्या गति होती है?-- अर्जुन कहे तमाल-श्याम । इंद्रियोंसे गोचर तू ब्रह्म । करते हैं तेरे शब्द-ग्राम । साशंक हमको ॥ ३४ ॥ अन्य नहीं शास्त्रके बिन । जीवका स्व-मोक्ष साधन । ऐसे कहता तू श्रीकृष्ण । किसभांति ॥ ३५ ॥ यदि न मिलता ऐसा देश । तथा नहीं काल अवकाश । करना ऐसा शास्त्राभ्यास । वह भी दूर ॥ ३६ ॥ तथा अभ्यासके जो साधन । वह भी प्राप्त नहीं है जान । ऐसेमें करें क्या कैसे कौन । अभ्यास उसका ॥ ३७ ॥ अनुकूल नहीं प्राचीन । प्रज्ञाका साथ जिसे जान । दूर है शास्त्र-संपादन । उसके लिये ॥ ३८ ॥ अजी ! मानते शास्त्रका विषय । नहीं मिलता एक भी आश्रय । इसीलिये जिन्होंने छोड दिया । शास्त्रका विचार ॥ ३९ ॥ किंतु निर्धार कर शास्त्र । अर्थानुष्ठानसे पवित्र । वास करते जो पात्र । सुख पूर्वक ॥ ४० ॥ उनका-सा हमको होना । ऐसे सोच चित्तमें जान । करते हैं आलंबन । उस मार्गका ॥ ४१ ॥ देखके पाठके अक्षर । करे बालक अनुसर । अंधा चलता आगे कर । भलेको जैसे ॥ ४२ ॥ वैसे सर्व शास्त्र निपुण । उनका देख आचरण । चलते हैं जान प्रमाण । श्रद्धासे आप ॥ ४३ ॥ फिर शिवाविक पूजन । तथा भूम्यादि महादान । अग्नि-होत्रादि जो यजन । करते श्रद्धासे ॥ ४४ ॥ उन्हे कह सत्य रज तम । किसमें गिनता पुरुषोत्तम । मिले उनको कौन गति हम । जाने कैसे ॥ ४५ ॥ वैकुंठ पीठका तब लिंग । निगम-पद्मका जो पराग । जिसकी अंग छाया है जग । जीवित जान ॥ ४६ ॥ (३२) ६७३: श्रद्धा-निरूपण-ओवि